टीवी चैनल दूरदर्शन का इतिहास !

भारत में टेलीविज़न इतिहास के इतिहास से ही शुरू होता है हर भारतीय को उसपर गर्व होना चाहिए की उसके पास टेलीविज़न के रूप में दूरदर्शन का गवरवशाली इतिहास मौजूद है | कौन याद नहीं करना चाहेगा उन सुनहरे दिनों को जब गांव के इक्के-दुक्के लोगो के पास ही छोटे से परदे पर चलती बोलती तस्वीरें दिखाने वाला बिजली से चलने वाला वह  डिब्बा हुआ करता था |एक ऐसा भी समय था जब सभी के दिलो पर दूरदर्शन का ही राज चलता था। लोग एक गांव से दूसरे गांव चले जाया करते थे दूरदर्शन के करिक्रमो को देखने के लिये। सभी एक साथ बैठ कर दूरदर्शन के करिक्रमो को देखा करते थे। दूरदर्शन का भी  एक समय था जब दूरदर्शन के करिक्रमो को देखने के लिए पूरा भारत ठहर जाता था। दूरदर्शन के करिक्रमो का मुकाबला करना आज भी किसी के बस की बात नहीं चाहे वह रामानंद सागर जी का रामायण हो या बीआर चोपड़ा जी का महाभारत। धीरे-धीरे  वक्त बीतता गया और वक्त के साथ- साथ कई और चैनल और उनके कारिक्रम आये और दूरदर्शन के कारिक्रम कही गुमनाम  से होने लगे लेकिन फिर भी जब लॉकडाउन के दौरान लोगो के मांग पर जब दूरदर्शन के करिक्रमो का पुनः प्रशारण हो रहा है वही दूसरी तरफ ये नए नए रिकॉर्ड अपने नाम दर्ज कर रहे है। अगर आप मने तो सही माईने में अर्थ पूर्ण करिक्रमो और भारतीय संस्कृति को बचाये रखते हुए देश के भावनाओ को स्तर देने का काम दूरदर्शन ने ही किया है। आइये जानते है दूरदर्शन का गौवरवशाली इतिहास।

  दूरदर्शन का स्थापना कब हुआ। 

दूरदर्शन  की स्थापना 15 सितम्बर 1959 में लोक सेवा प्रसारण के रूप में हुथा।  आज दूरदर्शन के पास विशाल नेटवर्क है जिसमे मनोरंजन,ज्ञान,विज्ञानं,खेल और समाचार के चैनल है।  इसके आलावा इसमें 35 क्षेत्रीय सॅटॅलाइट चैनल भी है। जब दूरदर्शन का  शुरुआत हुआ था तब दूरदर्शन का प्रसारण हफ़्ते में वो भी आधे घंटे के लिए हुआ करता था। हम आप को बता दे की पाहले दूरदर्शन क नाम इंग्लिश में ‘टेलीविज़न इंडिया’ रखा गया था फिर 1975  में इसे बदल कर ‘दूरदर्शन’  कर दिया गया। दूरदर्शन का मतलब होता है ‘दूर की चीजों को दिखाना’।  वक्त के साथ चलने  में दूरदर्शन ने कई उतर चढाव तय किये है फिर भी ये हमें सूचना , शिक्षा, मनोरंजन देता रह। शुरुआत में दूरदर्शन की विकाश यात्रा काफी धीमी रही।  हम आप को बताना चाहेंगे की 1982 में ‘रंगीन टीवी’ आ जाने के बाद लोग दूरदर्शन के तरफ ज्यादा आकर्षित होने लगे।  हम आप को बता दे की शुरुआत में  इसके दायरे में दिल्ली के आस पास सिर्फ 40 किलोमीटर के इलाके थे। 1975 तक भारत में सिर्फ 7 शहरों में  टीवी सर्विसेस उपलब्ध था और दूरदर्शन की इश्क अकेला सर्विस प्रोवाइडर था।  15 सितम्बर 1959 को ‘UNISCO’ ने  दूरदर्शन के प्रसारण के लिए भारत को 20 हजार डॉलर और 180 फिलिफ्स टीवी सेट्स दिए कहा जाता है की जर्मन से आये लोगो ने ब्रांडकास्टिंग का सामान डोनेट किया था। जैसा की हमने आप को पहले ही बताया था की पहले दूरदर्शन का प्रसारण हफ्ते में तीन दिन वो भी आधे घंटे के लिए हुआ करता था फिर बाद में वर्ष 1965 में दूरदर्शन का डेली बोडकास्ट होने लगा।  इसी वर्ष दुर्र्दर्शन ने अपना पांच मिनट न्यूज़ बुलटेन की शुरुआत की।  दूरदर्शन के प्रसारण के लिए ‘आल इंडिया रेडियो’ ने फ्लो स्पेस और न्यूज़ कंटेंट मुहैया कराय। 10  वर्षो के अंदर 180  टीवी सेट्स की संख्या बढ़कर 1250  हो गई और वर्ष 1977 तक यह संख्या बढ़ कर करीब 2.5  लाख तक पहुंच गयी।  पहले दूरदर्शन आल इंडिया रेडियो का एअक हिस्सा था फिर बाद में 1 अप्रैल 1976 में दूरदर्शन को अलग कर दिया गया। इसके अलग होने की घोषणा खुद ‘इंद्रा गाँधी ‘ जी ने टेलीविज़न पर आकर किया था। इसके बाद आल इंडिया रेडियो और दूरदर्शन के कार्यकालय क प्रबंध दिल्ली में अलग अलग महानिदेशकों द्वारा होने लगा। आज भी दूरदर्शन का सबसे बड़ा नेटवर्क है।  दूरदर्शन के अंतर्रस्तटीय चैनल ‘डीडी इंडिया’ का  अभी भी 146 देशो में प्रसारण होता है।  दूरदर्शन के कई अलग – अलग चैनल है जिसमे 25 आन्तररास्टीय और 6 राष्टीय चैनल है। इसके अलावा 17 से ज्यादा रीजनल सॅटॅलाइट चैनल है। आइये जानते है दूरदर्शन के आँख यानि की दूरदर्शन के लगो की दिलचस्प कहानी।

दूरदर्शन का लोगो किसने बनाया ?

जब दूरदर्शन ने आल इंडिया रेडियो से अलग होने का फैसला किया तब उनको अपना एक लोगो भी चाहिए था। इसकी जिम्मेदारी उन्होंने NID के क्षात्रों को दी गई ।  जिसमे से NID के एक क्षात्र थे ‘देवाशीष भट्ट्याचार्य’ जी जिन्होंने दूरदर्शन के लोगो को डिज़ाइन किया एक मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक देवाशीष जी ने इंसान के आँख के आकर का लोगो बनाया। इसके दोनों तरफ उन्होंने कर्व यिन और यांग बनाए।  इन आठ क्षात्रों और उनको छे: फैसलिटी मेम्बर्स ने कई डिज़ाइन तैयार किए। जिसमे से ‘देवाशीष’ जी का लोगो खुद इंद्रा गाँधी जी ने चुना था। इस खास डिज़ाइन को रूप देने के लिए इसमें एनीमेशन की आवश्यकता थी।  एनीमेशन का काम किया NID के ही एक अन्य क्षात्र ‘RL मिस्त्री’ ने। उन्होंने पहले तो लोगो का फोटो खींचा और उसे तब तक रोटेट करते रहे जब तक उसने अंतिम लोगो का रूप न लेलिया। इसी आँख को आज हम ‘डीडी आई’ के नाम से जानते है। लोगो के साथ चलने वाले संगीत को पंडित ‘रविशंकर’ ने ‘उस्ताद अहमद हुसैन’ के साथ मिलकर तैयार किया था।  लोगो के साथ चलने वाले थीम संगीत को पहली बार 1 अप्रैल वर्ष 1976 को टेलीविज़न स्क्रीन पर सुनाया गया।  देवाशीष जी ने एक मीडिया वेबसाइट को दिए इंटरबियु में कहा था की हमने लोगो को इतना आसान बनाया है की वह सब के समझ में आजाये। आइये जानते है दूरदर्शन के पहले कारिक्रम के बारे में।

दूरदर्शन का पहला कारिक्रम।

दोस्तों  दूरदर्शन पर कई बेहतरीन और लोकप्रिय करिक्रमो का प्रसारण हुआ जैसे की रामायण,महाभारत,शक्तिमान,विक्रम बेताल और भी बहुत कुछ लेकिन जब बात आती है दूरदर्शन के पहले कारिक्रम की तो हम आप को बता दे की दूरदर्शन के पहले कारिक्रम का नाम है ‘कृषि दर्शन। कृषि दर्शन की शुरुआत 26 जनवरी 1967 में हुआ और इसके 3600 से ज्यादा एपिसोड्स और 52 सीजन आ चुके है।  यह भारत में सबसे लम्बे समय तक चलने वाला टीवी श्रंखला है। हम आपको बता दे की 2015 में इसे डीडी नेशनल से स्थानांतरित करके ‘डीडी किसान’
पर प्रसारित होने लगा लेकिन ये डीडी नेशनल पर भी प्रसारित किया जाता है।

दोस्तों आज के लिए बस इतना ही तो मिलते अपने अगले स्टोरी में।  उम्मीद करते है की ये पोस्ट आप को अच्छी लगी होगी ऐसे ही और पोस्ट पढ़ने के लिए जुड़े रहिये ‘नारद टीवी’ से।

लेखक-मोहित दुबे 
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