आज पहली बार मैं स्कूल समय पर पहुँचा था लेकिन मोती से मिले बिना।मास्टर जी कक्षा में आए और पढ़ाने लगें।पर मेरा मन तो उदास था , पता नहीं मोती ने कुछ खाया होगा या नहीं और मैं आज उससे मिले बिना ही आ गया पता नहीं वह क्या कर रहा होगा।समय बीता , दोपहर हुई फिर शाम और स्कूल की छुट्टी।हमेशा की तरह आज भी मैं तेजी से घर की तरफ दौड़ा।

मैं हमेशा कि तरह आज भी स्कूल से जल्दी ही घर आ गया और बिना कुछ खाये पिए ही अपने दोस्त मोती सेे मिलने के लिए चल दिया। मोती मेरा पलतू पिल्ला था।उसकी माँ रानी ने चार पिल्लों को जन्म दिया था , जिसमें मोती सबसे छोटा था।
रानी हमारे गाँव की रखवाली किया करती थी और उसे जो कुछ भी मिल जाता था उसी में वह अपना और अपने बच्चों का पालन – पोषण करती थी।मैं मोती को बहुत प्यार करता था।मोती का रंग भी उन सभी में सबसे अच्छा और सुन्दर था उसकी आँखों में मुझे एक अजीब सी चमक और अपनापन दिखाई देता था।मैं मोती को हमेशा अपने खाने में से एक – दो रोटी दे दिया करता था शायद मुझे इससे वह आनंद प्राप्त होता था जो मैं आज महसूस कर सकता हूँ।
मेरा काफी समय मोती के साथ गुजर जाया करता था शायद उसे भी इसी चीज की आवश्यकता थी।मोती मेरे साथ रहकर वह सुख प्राप्त करता था जो शायद उसे उसकी बिरादरी में नहीं मिलती थी।मैं जब स्कूल चला जाता तो मोती मुझे दूर तक जाते देखता रहता और जब मैं उसकी आँखों से ओझल हो जाता तो वह उदास मन से वहीं बैठ कर मेरा इंतजार करता जहाँ वह हमेशा किया करता।
मैं स्कूल में हमेशा मोती के बारें में ही सोचता रहता और उसी की याद में खोया रहता।अचानक मास्टर जी ने कहा अरविन्द खड़े हो जाओ , मैं अचानक सा लड़खड़ाते हुए खड़ा हुआ।जी मास्टर जी ! मैंने कहा।मास्टर जी ने पूछा तुम कक्षा में प्रतिदिन देर से क्यों पहुँचते हो और तुम्हारा गृह कार्य भी पूरा नहीं रहता।
कहकर मास्टर जी ने मुझे दो चाटे जड़ दिए और घर पर भी शिकायत कर दी।
छुट्टी होने के बाद मैं  घर पहुँचा और हमेशा की तरह बिना कुछ खाए – पिए चल दिया अपने मित्र मोती से मिलने।
अभी मैं रास्ते में ही पहुँचा था कि सामने से पिताजी आते हुए दिखाई दिए मैं डर कर घर भाग आया।घर पहुँचने के बाद पिताजी ने मुझको बुलाया , उनके चेहरे के गुस्से को पहचान गया और सोचने लगा कि आज तो जमकर धुलाई होने वाली है।
पिताजी ने पूछा कि तुम स्कूल देर से क्यों पहुँचते हो और तुम्हारा गृह कार्य पूरा क्यों नहीं होता।आज तुम्हारी वजह से मुझे मास्टर जी की शिकायत सुननी पड़ी।
मैं कुछ कहता और सफाई देता इससे पहले पिताजी ने मुझे कई तमाचे जड़ें । किसी तरह माँ ने मुझे बचा लिया।शाम को मैं अपने दोस्त मोती से मिलने पहुँचा । मोती हमेशा की तरह वहीं मेरा इंतजार कर रहा था जहाँ वह किया करता था।मुझे देखते ही वह अपनी पूछ हिलाते हुए मेरे पास पहुँचा और मेरा मुँह सुँघने लगा जैसे वह मुझसे पुछना चाहता हो कि मित्र तुम्हें आज आने में देर क्यों हो गई।
मैं कुछ बोल न सका और मेरी आँखों से आँसू बहने लगें।मैं मोती को गले लगाकर बहुत रोया और जवाब में मोती की आँखों से भी आँसू निकलने लगें।पहली बार मुझे उसके गहरे प्यार का एहसास हुआ।उस दिन मैं और मोती कुछ नहीं खाएँ और उदास मन से मैं मोती को वहीं छोड़कर घर चला गया।
अगले दिन मैं स्कूल के लिए तैयार हुआ और हमेशा की तरह मोती से मिलने के लिए चला।अचानक मेरे पाँव रूक गए सामने पिताजी थे।कहाँ जा रहे हो ? पिताजी ने पूछा।मैं कुछ न कह सका और दौड़कर मैं स्कूल के रास्ते चला गया।
आज पहली बार मैं स्कूल समय पर पहुँचा था लेकिन मोती से मिले बिना।मास्टर जी कक्षा में आए और पढ़ाने लगें।पर मेरा मन तो उदास था , पता नहीं मोती ने कुछ खाया होगा या नहीं और मैं आज उससे मिले बिना ही आ गया पता नहीं वह क्या कर रहा होगा।समय बीता , दोपहर हुई फिर शाम और स्कूल की छुट्टी।हमेशा की तरह आज भी मैं तेजी से घर की तरफ दौड़ा।
पर आज मेरा मन और उदास हो गया जब मैंने मोती को उस स्थान पर नहीं देखा जहाँ वह मेरा इंतजार करता था। धीरे- धीरे मेरा मोती से मिलना कम होता गया लेकिन उसके लिए मेरा प्यार और बढ़ता गया।और एक दिन वह भी आया जब मैं मोती से मिला वह गाँव के बाहर रहने लगा था।दूर से ही जब मोती ने मुझे आते हुए देखा तो वह अपनी पूरी तेजी के साथ मेरे पास आया और आकर मेरे शरीर पर कूदने लगा।
मैं उससे लिपटकर रोने लगा लेकिन इस बार मेरी आँखों में खुशी के आँसू थे।मैंने कहा मित्र अब मैं तुमसे कभी दूर नहीं जाऊँगा।मोती मेरा साथ पाकर बहुत खुश था और उससे ज्यादा कहीं मैं।मैं उसे अपने साथ घर लाया और खाना खिलाया।सारा दिन मैं और मोती घूमते रहें , बगीचे में , नदी किनारे , फूस के ढेर पर और शाम को हम दोनों वापस आ गए।मैं घर चला गया और मोती वहीं एक कोने में सुबह का इंतजार करने लगा।
मोती के प्रति मेरा यह प्यार मुझे उससे दूर नहीं होने देता था और उसे मुझसे।
समय बीतता गया और हम दोनों भी समय के साथ गुजरने लगे।
सर्दियों के दिन आ गए थे।मैंने मोती के लिए पुआल और घास का ढेर इकठ्ठा कर दिया था ताकि वह ठंड से अपना बचाव कर सके।
मोती उसी ढेर में जाकर सो जाता और अपने आपको ठंड से बचा लेता।
गाँव वालों ने एक रात मोती को गाँव के बाहर भगा दिया।वह बेचारा सारी रात ठंड के कारण ठिठूरता रहा पर किसी को दया न आयी।
अगली सुबह जब मैं उठा और स्कूल जाने के लिए तैयार हुआ तो मेरे मन में मोती का ख्याल आया कि वह सारी रात कहाँ रहा होगा कैसा रहा होगा।मैं स्कूल जाने लगा तो मोती हमेशा की तरह वहीं था जहां से वह मुझे स्कूल जाते देखता था।पर आज मोती बैठा नहीं बल्कि सोया ही था।मैं पास गया तो मेरे हाथ से बस्ता छूट गया और मैं स्तब्ध सा जमीन पर बैठ गया।मोती शायद अब मुझे जाता हुआ कभी नहीं देख पायेगा क्योंकि वह मुझे हमेशा के लिए छोड़कर जा चुका था।मैं मोती को गोद में उठाकर फूट फूटकर बहुत रोया। शायद वह ठंड को और अधिक सहन नहीं कर पाया था।पर मरते मरते वह उसी स्थान पर आ गया था जहाँ से वह मुझे जाते हुए देखता था शायद उसे अब भी मेरे आने का ख्याल था उसकी इसी बात को सोचकर मैं उस दिन बहुत रोया।
और आज भी जब उसकी इस बात को याद करता हूँ तो सिहर जाता हूँ और मन बहुत रोता है पर आँसू नहीं गिरते।
लेखक – अरविन्द मिश्र 
अगर आपके अंदर भी छिपा है एक लेखक तो आप भी अपनी रचनाएँ हमें भेज सकतें हैं – naaradtv@gmail.com
Share On
  •  
  •  
  •  
  •  
  •  
  •  
  •  

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *