सुभाष गुप्ते: स्पिन का जादूगर…. लेकिन एक फोन कॉल और खत्म हो गया करियर

खेलों की दुनिया में अक्सर ऐसा होता कि किसी खिलाड़ी को उसकी प्रतिभा और उपलब्धियों के अनुपात में सम्मान और यश नही मिल पाता है और भारत जैसे देश में तो यह बात ज्यादा ही सटीक है जहां समाज जाति, धर्म, वर्ग और क्षेत्र की असमानताओं के कारण कई हिस्सों में बंटा हुआ है, और शायद इसीलिए भारत के पहले और कई दशकों तक एकमात्र ओलिंपिक पदक विजेता खाशाबा जाधव को ओलिंपिक में जाने के लिए चंदा तक करना पड़ा था, उन्हें सरकारी नौकरी में बिल्कुल रिटायरमेंट के करीब एक प्रमोशन दिया गया, खैर आज हम किसी अन्य के बारे में ही बल्कि क्रिकेट के एक ऐसे खिलाडी के बारे में बात करने वाले हैं, जिसको स्पिन का जादूगर कहा जाता था, जिसकी गुगली अच्छे अच्छे बल्लेबाजों के लिए अबूझ पहेली बन कर रह जाती थी और जब तक बल्लेबाज कुछ समझ पाता था, तब तक अम्पायर की ऊँगली हवा में खड़ी हो चुकी होती थी, लेकिन 1950 के दशक के उस कलाई के जादूगर गेंदबाज का नाम भी आज के क्रिकेट प्रेमी शायद ही जानते होंगे, हम बात कर रहे हैं सुभाष गुप्ते की, जिसका करियर सिर्फ एक फोन कॉल के कारण समय से बहुत पहले ही खत्म हो गया, आखिर क्या हुआ था इस महान गेंदबाज के साथ, कैसे हो गया उसके करियर क दुखद अंत, आज हम यही जानने की कोशिश करेंगे इस वीडियो में, लेकिन उससे पहले उनके प्राम्भिक जीवन और क्रिकेट के लगाव की कहानी जान लेते हैं

सुभाष का जन्म 11 दिसंबर साल 1929 को मुंबई में हुआ था, उस दौर में क्रिकेट बहुत अधिक लोकप्रिय नही था और हर भारतीय जो खिलाड़ी बनना चाहता था, उसका सपना देश की हॉकी टीम में शामिल होकर देश के लिए ओलम्पिक खेलने का होता था, सुभाष के जन्म के समय तो भारत की अपनी कोई क्रिकेट टीम भी नही थी, भारत ने अपना टेस्ट साल 1932 में खेला था, खैर सुभाष को क्रिकेट में दिलचस्पी थी और घरेलू क्रिकेट में बेहतरीन प्रदर्शन करके उन्होंने भारतीय टीम के लिए रास्ता बना लिया, उनके शुरुआती जीवन के बारे में बहुत ज्यादा जानकारी हमे नही मिल सकी है, लेकिन उनके घरेलू क्रिकेट आंकड़े काफी शानदार रहे हैं, गुप्ते की गेंदबाजी की खासियत उनकी गुगली बॉलिंग थी जिसे पढ़ पाना बड़े-बड़े बल्लेबाजों के लिए आसान नहीं था, गुप्ते लेग-स्पिनर थे, जो गेंद को तेज गति दे सकते थे, साथ ही एक पिन-पॉइंट लाइन और लम्बाई जिससे बल्लेबाजों के लिए चीजें बहुत मुश्किल हो जाती थीं, वह हमेशा गेंद को बहुत अधिक फ्लाईट दे सकते थे और उसके खजाने में दो प्रकार की गुगली थी, जो बल्लेबाजों के लिए मुश्किलें पैदा कर देती थी

सुभाष ने अपना पहला टेस्ट मैच साल 1952 में कोलकाता में इंग्लैंड के खिलाफ खेला, इस मैच में सुभाष का प्रदर्शन अच्छा नही रहा और उन्हें इस मैच में एक विकेट भी नही मिला, इसके बाद उन्होंने अगला मैच पाकिस्तान के खिलाफ मुंबई में खेला, जहाँ उन्हें अपने करियर का पहला विकेट मिला, लेकिन सुभाष को असली पहचान मिली इसी साल वेस्टइंडीज के दौरे से, इस दौरे पर सुभाष गुप्ते वेस्टइंडियन बल्लेबाजों के लिए अबूझ पहेली साबित हुए, यहां उन्होंने कुल 50 फर्स्ट क्लास विकेट चटकाए, इसमें से 27 टेस्ट विकेट शामिल थे, जो उन्होंने ऐसी पिच पर लिए जो बैटिंग के लिए जानी जाती थी, इसके बाद 1954-55 में बंबई के लिए खेल रहे गुप्ते ने पाकिस्तान संयुक्त सेवाओं और बहावलपुर इलेवन के सभी 10 विकेट लिए थे, साल 1954-55 में पाकिस्तान दौरे पर गुप्ते ने 21 विकेट लेकर पूरी दुनिया में अपनी फिरकी का जादू चला दिया था, फिर न्यूजीलैंड में 34 विकेट लेकर गुप्ते ने नया इतिहास रच दिया

अब सुभाष का करियर पूरे चरम पर था और वो लगातार अपनी प्रतिभा की चमक बिखेर रहे थे, साल 1956-57 में वेस्टइंडीज के खिलाफ कानपुर टेस्ट में सुभाष ने एक बार फिर शानदार गेंदबाजी की, इस मैच में एक पारी में गुप्ते ने 9 विकेट लिए, इस पारी का 10 वां विकेट भी सुभाष के नाम हो सकता था, अगर विकेट कीपर नरेन तम्हाने लांस गिब्स का कैच न गिराते, यही नहीं इस सीरीज के अंत में गुप्ते ने 22 विकेट लिए थे, अब बात करते हैं उस घटना की, जिसका जिक्र हमने टाइटल में किया था और जिसके कारण सुभाष गुप्ते का करियर खत्म हो गया और देश ने एक ऐसा खिलाड़ी गवां दिया जो कई मील के पत्थर स्थापित कर सकता था

ये बात है साल १९61 की, जब इंग्लैंड की टीम भारत दौरे पर आई हुई थी, इस सीरीज में सुभाष ने कानपुर टेस्ट में एक बार फिर से जबरदस्त प्रदर्शन किया था और 20 रन देकर 5 विकेट झटके थे, इसी सीरीज का तीसरा मैच दिल्ली में खेला जाना था और भारतीय टीम दिल्ली के इम्पीरियल होटल में ठहरी हुई थी, इसी होटल की रिसेप्शनिस्ट ने शिकायत की कि उसके साथ भारतीय टीम के एक खिलाड़ी ने फोन पर छेड़छाड़ की है, जिस रूम से रिसेप्शनिस्ट को फोन किया गया था वह रूम सुभाष गुप्ते का था और उनके रूम-मेट एजी कृपाल सिंह थे, फोन करने वाले पर, रूम में रिसेप्शनिस्ट को बुलाने और डेट पर चलने के लिए परेशान करने का आरोप लगाया गया, उस रिसेप्शनिस्ट ने इसकी शिकायत भारतीय टीम के मैनेजर से की, कृपाल सिंह ने बाद में सुभाष के सामने अपनी गलती मानी, जब सुभाष ने यह बात बोर्ड के एक सदस्य को बताई तो उन्होंने कहा कि कृपाल को अपने कमरे का फोन क्यों इस्तेमाल करने दिया, इस पर सुभाष ने कहा कि वह वयस्क और समझदार पुरुष हैं, मैं उनको कैसे रोक सकता था? क्रिकेट प्रशासक गुप्ते से नाराज़ थे कि उन्होंने उस वक़्त मामले में दखल क्यों नहीं दिया, दोनों खिलाड़ियों पर अनुशासन की कार्रवाई के तहत उन्हें अगले दो टेस्ट के लिए टीम से निकाल दिया गया, जबकि कप्तान नारी कॉन्ट्रेक्टर का कहना था गुप्ते उनके कमरे में ताश खेल रहे थे, कप्तान नारी कॉन्ट्रैक्टर, ने बोर्ड को समझाया कि ऐसा कुछ भी नहीं हुआ, उसके साथियों पर गलत आरोप लगाया गया, लेकिन उनकी बात भी नही सुनी गयी, यह माना जाता है कि यह एक झूठा आरोप था, और गुप्ते को इस गड़बड़ी में घसीटा गया था जो उनसे किसी भी तरह से संबंधित नही था, इसके बाद बोर्ड ने निर्णय लिया कि वेस्टइंडीज के दौरे के लिए इन दोनों खिलाड़ी पर विचार नहीं किया जाना चाहिए, कभी अनुशासनहीनता न करने वाले सुभाष गुप्ते को यह अपमान बर्दाश्त नहीं हुआ और उन्होंने भारतीय टीम और टेस्ट क्रिकेट को अलविदा कह दिया, दिल्ली टेस्ट उनके करियर का आखिरी टेस्ट साबित हुआ

करियर में उतार चढ़ाव और असमय करियर खत्म होने के बाद वो त्रिनिदाद जाकर बस गए, दरअसल 1952 में जब भारतीय टीम वेस्टइंडीज दौरे पर गयी थी तब सुभाष न सिर्फ अपने प्रदर्शन बल्कि अपने रोमांस के किस्सों के कारण भी खूब चर्चा में रहे थे, उनका वास्तविक प्रेम प्रसंग भी उसी दौरे पर शुरू हुआ जब ट्रिनिडाड की एक लड़की, कैरोल से उनका प्रेम शुरू हुआ, उनके भारत लौटने के बाद भी चिट्ठियों से उनका यह प्रसंग जारी रहा और फिर दोनों ने शादी कर ली, और क्रिकेट को अलविदा कहने के बाद सुभाष अपनी पत्नी कैरोल के साथ त्रिनिदाद में ही रहने लगे, उनकी प्रेम कहानी पर एक किताब भी लिखी गई है

स्पिन का जादूगर माने जाने वाले गुप्ते ने भारत के लिए 36 टेस्ट में 29.55 की औसत से 149 विकेट लिए थे और वह सिर्फ 32 वर्ष के थे जब उन्हें टीम से ड्राप किया गया, कई लोग अब भी मानते हैं कि अगर वह भारत के लिए अपने करियर के अंत तक खेलते, तो वे बहुत ऊंचाइयों पर पहुंच सकते थे, बिशन सिंह बेदी और वीनू मांकड़ जैसे खिलाडियों ने उनसे प्रेरित होकर स्पिन गेंदबाजी शुरू की और महान खिलाड़ी बने, लेकिन शायद सुभाष गुप्ते के नसीब में ये सम्मान नही था

साल 2002 जून में 72 साल की उम्र में गुप्ते निधन हो गया जब वह और उनकी पत्नी त्रिनिदाद में वेस्टइंडीज के दौरे पर आ रही भारतीय क्रिकेट टीम के स्वागत की तैयारी कर रहे थे, जब सुभाष की पत्नी कैरोल भारतीय टीम से मिली तब उन्होंने सौरव गांगुली से कहा कि शायद सुभाष की आत्मा उनकी टीम के साथ अपने देश वापसी करना चाहती है, भले ही आज की पीढ़ी उनके बारे में बहुत ज्यादा न जानती हो, लेकिन भारतीय क्रिकेट में अतुलनीय योगदान को कभी भुलाया नही जा सकता है, नारद टीवी की टीम उनकी आत्मा की शांति के लिए प्रार्थना करती है.

 

Writer -Aalok Shukla 

Share On
  •  
  •  
  •  
  •  
  •  
  •  
  •  

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *