अफगानिस्तान में मिली प्राचीन गार्देज़ गणपति की मूर्ति का इतिहास और पुरातत्व विभाग की खोज
बीबीसी हिंदी की रिपोर्ट के अनुसार, साल 1956 में अफगानिस्तान गए भारतीय पुरातत्व विभाग के दल ने गार्देज़ गणपति की प्राचीन मूर्ति की खोज की थी। इस दल में शामिल टीएन रामचंद्रन और वाईडी शर्मा ने अपनी विस्तृत रिपोर्ट नई दिल्ली में सौंपी थी। यह ऐतिहासिक खोज अफगानिस्तान में भारतीय पुरातत्वविदों के योगदान और प्राचीन सांस्कृतिक संबंधों को रेखांकित करती है, जिसके बारे में आज भी चर्चा की जाती है।
VIMARSHNAARAD TVअफगानिस्तान की धरती पर मिली प्राचीन गार्देज़ गणपति की मूर्ति का इतिहास काफी दिलचस्प है। बीबीसी हिंदी के अनुसार, इस मूर्ति की खोज का श्रेय भारतीय पुरातत्व विभाग के विशेषज्ञों को जाता है। साल 1956 में भारत से एक विशेष दल अफगानिस्तान के दौरे पर गया था। इस दल में पुरातत्व विभाग के दो वरिष्ठ अधिकारी टीएन रामचंद्रन और वाईडी शर्मा शामिल थे।
अपनी यात्रा के दौरान, इन विशेषज्ञों ने गार्देज़ क्षेत्र में इस प्राचीन मूर्ति को खोज निकाला। यह खोज उस समय पुरातत्व जगत के लिए एक महत्वपूर्ण घटना मानी गई थी। मूर्ति की बनावट और उसकी ऐतिहासिकता ने विशेषज्ञों का ध्यान अपनी ओर आकर्षित किया। यह मूर्ति न केवल कलात्मक दृष्टि से महत्वपूर्ण थी, बल्कि यह उस क्षेत्र के प्राचीन इतिहास को समझने में भी सहायक साबित हुई।
टीएन रामचंद्रन और वाईडी शर्मा ने इस खोज के बाद एक विस्तृत रिपोर्ट तैयार की थी। इस रिपोर्ट को उन्होंने नई दिल्ली स्थित पुरातत्व विभाग के मुख्यालय में जमा किया था। इस दस्तावेज़ में मूर्ति के स्थान, उसकी स्थिति और ऐतिहासिक महत्व का पूरा विवरण दिया गया था। यह रिपोर्ट आज भी उस समय के पुरातात्विक कार्यों के प्रमाण के रूप में देखी जाती है।
अफगानिस्तान में भारतीय पुरातत्वविदों की यह सक्रियता दोनों देशों के बीच प्राचीन सांस्कृतिक संबंधों की एक कड़ी को दर्शाती है। गार्देज़ गणपति की मूर्ति का मिलना इस बात का प्रमाण है कि इस क्षेत्र में प्राचीन काल में भारतीय संस्कृति का प्रभाव रहा होगा। विशेषज्ञों का मानना है कि ऐसी खोजें इतिहास के उन अनसुलझे पहलुओं पर रोशनी डालती हैं जो समय के साथ धुंधले हो गए थे।
आज भी जब इस मूर्ति की चर्चा होती है, तो 1956 के उस अभियान को याद किया जाता है। टीएन रामचंद्रन और वाईडी शर्मा के प्रयासों ने न केवल एक अमूल्य धरोहर को दुनिया के सामने रखा, बल्कि भारतीय पुरातत्व विभाग की कार्यक्षमता को भी अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहचान दिलाई। यह खोज आज भी शोधकर्ताओं के लिए अध्ययन का एक महत्वपूर्ण विषय बनी हुई है।