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इलाहाबाद हाईकोर्ट का सख्त रुख: अवैध हिरासत मामले में एसएचओ की जेब से वसूला जाएगा जुर्माना

अमर उजाला की रिपोर्ट के अनुसार, देवरिया के गौरी बाजार थाने में चार लोगों को अवैध रूप से हिरासत में रखने के मामले में इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कड़ा रुख अपनाया है। अदालत ने पुलिस अधिकारियों से सीसीटीवी फुटेज के बारे में तीखे सवाल किए। मामले की गंभीरता को देखते हुए, अदालत ने आदेश दिया है कि 65 हजार रुपये का जुर्माना संबंधित एसएचओ के व्यक्तिगत वेतन से वसूला जाएगा।

उत्तर प्रदेश के देवरिया जिले से जुड़े एक मामले में इलाहाबाद हाईकोर्ट ने पुलिस की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल उठाए हैं। अमर उजाला की रिपोर्ट के अनुसार, मामला गौरी बाजार थाने में चार याचिकाकर्ताओं को कथित तौर पर अवैध हिरासत में रखने से संबंधित है।

बुधवार को हुई सुनवाई के दौरान, हाईकोर्ट ने पुलिस अधिकारियों से सीसीटीवी रिकॉर्डिंग के गायब होने को लेकर कड़े सवाल किए। अदालत ने जानना चाहा कि आखिर सीसीटीवी फुटेज कहां गई और पुलिस इस मामले में जवाब देने में विफल क्यों रही।

अदालत ने इस घटना को पुलिस की लापरवाही और अधिकारों के उल्लंघन के रूप में देखा। न्यायिक प्रक्रिया में पारदर्शिता बनाए रखने के उद्देश्य से, हाईकोर्ट ने इस मामले में सख्त दंडात्मक कार्रवाई का निर्णय लिया है।

न्यायालय ने आदेश दिया है कि याचिकाकर्ताओं को हुए नुकसान की भरपाई के लिए 65 हजार रुपये का जुर्माना लगाया जाए। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि यह राशि सरकारी खजाने से नहीं, बल्कि संबंधित एसएचओ की जेब से यानी उनके व्यक्तिगत वेतन से काटी जाएगी।

यह आदेश पुलिस बल के भीतर जवाबदेही तय करने की दिशा में एक बड़ा कदम माना जा रहा है। हाईकोर्ट की इस सख्ती से स्पष्ट है कि अवैध हिरासत जैसे मामलों में अदालत किसी भी प्रकार की कोताही बर्दाश्त करने के मूड में नहीं है।

अमर उजाला की रिपोर्ट के मुताबिक, इस मामले में एसपी और अन्य अधिकारियों की भूमिका पर भी सवाल उठे हैं। अदालत का यह रुख पुलिस प्रशासन के लिए एक कड़ा संदेश है कि कानून का पालन करना और नागरिकों के अधिकारों की रक्षा करना उनकी प्राथमिकता होनी चाहिए।

मामले की अगली कार्यवाही पर सबकी नजरें टिकी हैं। यह घटना न केवल देवरिया पुलिस के लिए बल्कि पूरे राज्य के पुलिस महकमे के लिए एक सबक है कि सीसीटीवी कैमरों की निगरानी और रिकॉर्डिंग को लेकर बरती गई लापरवाही के गंभीर परिणाम हो सकते हैं।

अदालत के इस फैसले ने पीड़ित पक्ष को न्याय की उम्मीद दी है। पुलिस की कार्यशैली में सुधार और जवाबदेही सुनिश्चित करने के लिए इस तरह के न्यायिक हस्तक्षेप को महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

स्रोत

मूल संदर्भ

01अमर उजाला नेटवर्क, प्रयागराजमूल रिपोर्ट देखें ↗