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इलाहाबाद हाईकोर्ट का स्पष्टीकरण: सीनियर सिटीजन एक्ट के तहत न्यायाधिकरण को जाली दस्तावेज रद्द करने का अधिकार नहीं

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण निर्णय में कहा है कि वरिष्ठ नागरिक अधिनियम के तहत गठित न्यायाधिकरण के पास किसी संपत्ति के दान विलेख को धोखाधड़ी या जाली घोषित कर रद्द करने का कानूनी अधिकार नहीं है। अदालत ने स्पष्ट किया कि स्वामित्व संबंधी विवादों और दस्तावेजों की वैधता की जांच करने का अधिकार केवल सिविल कोर्ट के पास ही सुरक्षित है।

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक मामले की सुनवाई के दौरान यह अहम कानूनी स्थिति स्पष्ट की है। अदालत ने अपने आदेश में कहा कि सीनियर सिटीजन एक्ट के अंतर्गत गठित न्यायाधिकरण (ट्रिब्यूनल) को यह शक्ति प्राप्त नहीं है कि वह किसी संपत्ति के हस्तांतरण या दान विलेख (गिफ्ट डीड) को कूटरचित या धोखाधड़ी से तैयार किया गया मानकर उसे निरस्त कर सके।

न्यायालय ने इस बात पर जोर दिया कि संपत्ति के मालिकाना हक से जुड़े विवाद और दस्तावेजों की सत्यता की जांच करना सिविल कोर्ट का कार्यक्षेत्र है। न्यायाधिकरण का दायित्व मुख्य रूप से वरिष्ठ नागरिकों के भरण-पोषण और उनके कल्याण से संबंधित मामलों तक सीमित है। ऐसे में, किसी दस्तावेज को जाली करार देना न्यायाधिकरण के अधिकार क्षेत्र से बाहर है।

यह मामला तब सामने आया जब एक संपत्ति के दान विलेख को चुनौती दी गई थी। याचिकाकर्ता ने न्यायाधिकरण के समक्ष दस्तावेज को रद्द करने की मांग की थी। हालांकि, हाईकोर्ट ने इस पर रोक लगाते हुए कहा कि यदि किसी को लगता है कि कोई दस्तावेज धोखाधड़ी से तैयार किया गया है, तो उसे सिविल कोर्ट में ही वाद दायर करना चाहिए।

अदालत ने कहा कि कानून के तहत न्यायाधिकरण को सीमित शक्तियां दी गई हैं। इन शक्तियों का विस्तार करके उसे सिविल कोर्ट के अधिकारों का प्रयोग करने की अनुमति नहीं दी जा सकती। यह व्यवस्था न्यायिक प्रक्रिया में स्पष्टता बनाए रखने के लिए आवश्यक है ताकि विभिन्न अदालतों और न्यायाधिकरणों के कार्यक्षेत्र में टकराव न हो।

कानूनी जानकारों का मानना है कि हाईकोर्ट का यह फैसला संपत्ति विवादों के निपटारे में एक महत्वपूर्ण दिशा-निर्देश साबित होगा। इससे न्यायाधिकरणों पर अनावश्यक मुकदमों का बोझ कम होगा और वे अपने मूल उद्देश्यों पर अधिक ध्यान केंद्रित कर सकेंगे। साथ ही, यह नागरिकों को सही कानूनी मंच चुनने में मदद करेगा।

हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि यदि कोई व्यक्ति संपत्ति के दस्तावेजों को चुनौती देना चाहता है, तो उसे दीवानी अदालत की शरण लेनी होगी। वहां साक्ष्यों के आधार पर ही दस्तावेजों की वैधता तय की जा सकती है। इस निर्णय से यह सुनिश्चित हुआ है कि वरिष्ठ नागरिक अधिनियम का दुरुपयोग संपत्ति विवादों को सुलझाने के लिए नहीं किया जा सकता।

स्रोत

मूल संदर्भ

01अमर उजाला नेटवर्क, प्रयागराजमूल रिपोर्ट देखें ↗