ताज़ा अपडेटइलाहाबाद हाईकोर्ट की सख्त टिप्पणी: जजों को पूछताछ काउंटर के क्लर्क जैसा काम करने पर मजबूर होना पड़ा
Vimarsh Naarad TV logoस्वतंत्र डिजिटल न्यूज़Vimarsh–Naarad TVखबर • विमर्श • जनता की आवाज़
डिजिटल संस्करणYouTube
समाचार श्रेणियां

इलाहाबाद हाईकोर्ट की सख्त टिप्पणी: जजों को पूछताछ काउंटर के क्लर्क जैसा काम करने पर मजबूर होना पड़ा

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने आपराधिक अपीलों की सुनवाई के दौरान पेपर बुक उपलब्ध न होने पर गहरी नाराजगी जाहिर की है। अदालत ने कहा कि ऐसी स्थिति में जजों को पूछताछ काउंटर के क्लर्क की तरह काम करने के लिए मजबूर होना पड़ रहा है। बार-बार सुनवाई टालने की मांग पर कोर्ट ने तल्ख टिप्पणी करते हुए व्यवस्था में सुधार की आवश्यकता पर जोर दिया है।

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने आपराधिक मामलों की सुनवाई के दौरान सामने आई एक गंभीर समस्या पर कड़ा रुख अपनाया है। अदालत ने पाया कि आपराधिक अपीलों में पेपर बुक समय पर उपलब्ध नहीं कराई जा रही है, जिसके कारण सुनवाई को बार-बार स्थगित करने की मांग की जाती है। इस स्थिति पर नाराजगी जताते हुए कोर्ट ने कहा कि यह न्यायिक प्रक्रिया के लिए उचित नहीं है।

अदालत ने टिप्पणी की कि पेपर बुक की अनुपलब्धता के कारण जजों को अपनी मुख्य न्यायिक भूमिका के बजाय पूछताछ काउंटर के क्लर्क की तरह काम करना पड़ रहा है। यह स्थिति न केवल समय की बर्बादी है, बल्कि न्याय वितरण प्रणाली की कार्यक्षमता पर भी सवाल उठाती है। कोर्ट ने इस मामले को गंभीरता से लेते हुए संबंधित पक्षों को फटकार लगाई है।

अमर उजाला नेटवर्क, प्रयागराज की रिपोर्ट के अनुसार, हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया है कि न्यायिक कार्यों में इस तरह की बाधाएं स्वीकार्य नहीं हैं। बार-बार सुनवाई टालने की प्रवृत्ति पर रोक लगाने के लिए अदालत ने सख्त निर्देश दिए हैं। कोर्ट का मानना है कि पेपर बुक की उपलब्धता सुनिश्चित करना प्रशासन की जिम्मेदारी है ताकि जजों को अनावश्यक कार्यों में न उलझना पड़े।

न्यायालय ने इस बात पर जोर दिया कि न्याय की प्रक्रिया में देरी से वादियों को परेशानी होती है। जब तक आवश्यक दस्तावेज और पेपर बुक तैयार नहीं होंगे, तब तक मामलों का निपटारा समयबद्ध तरीके से नहीं हो पाएगा। हाईकोर्ट की यह टिप्पणी न्यायिक सुधारों की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम मानी जा रही है।

अदालत ने उम्मीद जताई है कि भविष्य में ऐसी स्थिति उत्पन्न नहीं होगी और संबंधित विभाग इस दिशा में तत्काल सुधारात्मक कदम उठाएंगे। न्यायिक गरिमा बनाए रखने के लिए यह आवश्यक है कि जजों को उनके मूल कर्तव्यों के निर्वहन के लिए अनुकूल वातावरण मिले।

यह मामला अदालती कामकाज में पारदर्शिता और दक्षता की कमी को भी उजागर करता है। हाईकोर्ट की इस तल्ख टिप्पणी के बाद अब संबंधित अधिकारियों पर व्यवस्था को दुरुस्त करने का दबाव बढ़ गया है।

अंत में, अदालत ने स्पष्ट किया कि न्याय में देरी न केवल कानून का उल्लंघन है, बल्कि यह आम जनता के भरोसे को भी प्रभावित करती है। हाईकोर्ट ने इस मामले में आगे की कार्रवाई के लिए कड़े संकेत दिए हैं ताकि भविष्य में सुनवाई के दौरान ऐसी बाधाएं न आएं।

स्रोत

मूल संदर्भ

01अमर उजाला नेटवर्क, प्रयागराजमूल रिपोर्ट देखें ↗