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इलाहाबाद हाईकोर्ट ने प्रशासनिक व्यवस्था पर जताई चिंता, जजों के संवाद के लिए मंच की कमी का मुद्दा

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने अपनी आंतरिक प्रशासनिक कार्यप्रणाली और न्यायाधीशों के बीच संवाद की कमी पर गंभीर चिंता व्यक्त की है। न्यायमूर्ति विनोद दिवाकर ने एक फैसले में उल्लेख किया कि पिछले एक दशक में फुल कोर्ट की बैठकें बहुत कम हुई हैं। अदालत ने कहा कि जजों के पास न्यायिक आदेशों के अलावा अपनी बात रखने का कोई अन्य मंच नहीं बचा है।

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने अपनी प्रशासनिक व्यवस्था और न्यायाधीशों के बीच संस्थागत संवाद को लेकर एक महत्वपूर्ण टिप्पणी की है। अमर उजाला की रिपोर्ट के अनुसार, न्यायमूर्ति विनोद दिवाकर ने 80 पन्नों के एक विस्तृत फैसले में इस बात पर जोर दिया है कि संस्था के भीतर संवाद की प्रक्रिया को मजबूत करने की आवश्यकता है।

न्यायमूर्ति दिवाकर ने अपने फैसले में आंकड़ों का हवाला देते हुए बताया कि पिछले 10 वर्षों में केवल 16 फुल कोर्ट बैठकें आयोजित की गई हैं। यह संख्या निर्धारित नियमों और प्रशासनिक आवश्यकताओं की तुलना में काफी कम है। उन्होंने कहा कि इस कमी के कारण न्यायाधीशों को अपनी बात रखने के लिए उचित मंच नहीं मिल पा रहा है।

अदालत ने स्पष्ट किया कि जब संस्थागत संवाद का अभाव होता है, तो न्यायाधीशों के पास अपने विचार या चिंताएं व्यक्त करने के लिए न्यायिक आदेशों के अलावा कोई अन्य विकल्प नहीं बचता। यह स्थिति प्रशासनिक पारदर्शिता और कार्यकुशलता के लिए चिंता का विषय है।

न्यायालय ने इस बात पर जोर दिया कि प्रशासनिक सुधारों के लिए नियमित बैठकें और खुला संवाद अनिवार्य है। इससे न केवल कार्यप्रणाली में सुधार होगा, बल्कि न्यायाधीशों के बीच बेहतर तालमेल भी स्थापित हो सकेगा।

यह टिप्पणी हाईकोर्ट की आंतरिक कार्यप्रणाली में सुधार की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम मानी जा रही है। अदालत ने प्रशासनिक ढांचे को अधिक समावेशी और संवादपूर्ण बनाने की आवश्यकता पर बल दिया है।

इस फैसले के बाद कानूनी गलियारों में प्रशासनिक बैठकों की आवृत्ति और न्यायाधीशों के बीच संवाद के महत्व पर चर्चा शुरू हो गई है। उम्मीद है कि भविष्य में इन सुझावों पर अमल किया जाएगा ताकि संस्थागत कार्यप्रणाली को और अधिक प्रभावी बनाया जा सके।

न्यायमूर्ति दिवाकर की यह टिप्पणी न्यायपालिका के भीतर प्रशासनिक सुधारों की आवश्यकता को रेखांकित करती है, जो एक स्वस्थ न्यायिक प्रणाली के लिए अत्यंत आवश्यक है।

स्रोत

मूल संदर्भ

01अमर उजाला नेटवर्क, प्रयागराजमूल रिपोर्ट देखें ↗