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इलाहाबाद हाईकोर्ट ने यूपी के मेडिकल कॉलेजों में संविदा कर्मियों के शोषण पर जताई गहरी चिंता

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने उत्तर प्रदेश के सरकारी मेडिकल और नर्सिंग कॉलेजों में लंबे समय से संविदा पर काम कर रहे कर्मचारियों की स्थिति पर कड़ा रुख अपनाया है। अदालत ने सरकार को निर्देश दिया है कि वह संविदा व्यवस्था के बजाय नियमित भर्तियां सुनिश्चित करे। कोर्ट का मानना है कि वर्षों से संविदा पर काम लेना कर्मचारियों के शोषण के समान है और इस व्यवस्था में तत्काल सुधार की आवश्यकता है।

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने यूपी के मेडिकल कॉलेजों में संविदा कर्मियों के शोषण पर जताई गहरी चिंता
लाइसेंस प्राप्त विषय चित्र: Prime Minister's Office · GODL-India · Wikimedia Commons

उत्तर प्रदेश के सरकारी मेडिकल और नर्सिंग कॉलेजों में कार्यरत संविदा कर्मचारियों के भविष्य को लेकर इलाहाबाद हाईकोर्ट ने गंभीर टिप्पणी की है। अमर उजाला की रिपोर्ट के अनुसार, अदालत ने इस बात पर नाराजगी जताई है कि राज्य के इन संस्थानों में वर्षों से नियमित नियुक्तियां करने के बजाय केवल संविदा के आधार पर काम चलाया जा रहा है।

न्यायालय ने स्पष्ट किया है कि लंबे समय तक कर्मचारियों को संविदा पर रखना उनके अधिकारों का हनन है। कोर्ट ने इसे एक प्रकार का शोषण करार देते हुए राज्य सरकार को फटकार लगाई है। अदालत का मानना है कि स्वास्थ्य और शिक्षा जैसे महत्वपूर्ण क्षेत्रों में काम करने वाले कर्मियों को स्थायी सुरक्षा मिलनी चाहिए।

अदालत ने सरकार को निर्देश दिए हैं कि वह इस व्यवस्था में बदलाव लाए और नियमित भर्ती प्रक्रिया शुरू करे। कोर्ट ने कहा कि संविदा के भरोसे संस्थानों को चलाना न केवल कर्मचारियों के लिए अनुचित है, बल्कि यह प्रशासनिक दृष्टिकोण से भी सही नहीं है।

इस मामले में हाईकोर्ट ने सरकार से जवाबदेही तय करने की बात कही है। अदालत ने यह सुनिश्चित करने को कहा है कि भविष्य में नियुक्तियों का आधार नियमित हो ताकि कर्मचारियों को उचित लाभ और सम्मान मिल सके।

यह आदेश उन हजारों कर्मचारियों के लिए राहत की खबर हो सकता है जो लंबे समय से अनिश्चितता के माहौल में काम कर रहे हैं। कोर्ट की इस टिप्पणी के बाद अब राज्य सरकार को अपनी भर्ती नीति की समीक्षा करनी पड़ सकती है।

फिलहाल, इस मामले पर सरकार की ओर से विस्तृत कार्ययोजना का इंतजार है। अदालत ने स्पष्ट कर दिया है कि संविदा के नाम पर कर्मचारियों का शोषण अब और अधिक समय तक बर्दाश्त नहीं किया जाएगा।

कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि हाईकोर्ट का यह कदम राज्य के सरकारी संस्थानों में कार्य संस्कृति और कर्मचारियों के मनोबल में सुधार लाने की दिशा में एक बड़ा बदलाव साबित हो सकता है।

स्रोत

मूल संदर्भ

01अमर उजाला नेटवर्क, प्रयागराजमूल रिपोर्ट देखें ↗