उत्तराखंड की दारमा घाटी में मंडराया भूस्खलन का गंभीर खतरा, 58 फीसदी आबादी पर संकट के बादल
वाडिया इंस्टीट्यूट की एक रिपोर्ट के अनुसार, पिथौरागढ़ की दारमा घाटी में भूस्खलन का बड़ा जोखिम पैदा हो गया है। घाटी का लगभग 9 प्रतिशत हिस्सा अत्यधिक संवेदनशील क्षेत्र में आता है, जिससे वहां रहने वाली 58 प्रतिशत आबादी सीधे तौर पर प्रभावित हो सकती है। चट्टानों के कमजोर होने से स्थानीय निवासियों के लिए सुरक्षा संबंधी चिंताएं बढ़ गई हैं।
VIMARSHNAARAD TVउत्तराखंड के पिथौरागढ़ जिले में स्थित दारमा घाटी पर भूस्खलन का गहरा संकट छाया हुआ है। वाडिया इंस्टीट्यूट ऑफ हिमालयन जियोलॉजी द्वारा किए गए अध्ययन में इस क्षेत्र की भौगोलिक स्थिति को लेकर चिंताजनक संकेत दिए गए हैं। रिपोर्ट के मुताबिक, घाटी का एक बड़ा हिस्सा भूस्खलन की दृष्टि से अत्यंत संवेदनशील बना हुआ है।
वैज्ञानिक विश्लेषण के अनुसार, दारमा घाटी का लगभग 9 प्रतिशत भू-भाग 'हाई रिस्क' जोन के अंतर्गत आता है। इस भौगोलिक अस्थिरता के कारण वहां रहने वाले लोगों का जीवन जोखिम में है। आंकड़ों के अनुसार, घाटी की कुल आबादी का 58 प्रतिशत हिस्सा इस खतरनाक दायरे में निवास कर रहा है, जिससे उनकी सुरक्षा पर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं।
विशेषज्ञों ने चेतावनी दी है कि क्षेत्र की चट्टानें लगातार कमजोर होती जा रही हैं। चट्टानों के ढीले होने और भूगर्भीय हलचल के कारण भूस्खलन की आशंका कई गुना बढ़ गई है। यह स्थिति न केवल स्थानीय निवासियों के लिए, बल्कि वहां के बुनियादी ढांचे के लिए भी एक बड़ी चुनौती पेश कर रही है।
पिथौरागढ़ का यह दुर्गम इलाका अपनी प्राकृतिक सुंदरता के लिए जाना जाता है, लेकिन अब यह भूगर्भीय आपदाओं के केंद्र के रूप में उभर रहा है। वाडिया इंस्टीट्यूट की यह रिपोर्ट प्रशासन और स्थानीय लोगों के लिए एक चेतावनी की तरह है।
अध्ययन में स्पष्ट किया गया है कि यदि समय रहते सावधानी नहीं बरती गई, तो स्थिति और भी विकट हो सकती है। भूस्खलन की बढ़ती घटनाओं के बीच, वहां की आबादी को सुरक्षित रखने के लिए ठोस कदम उठाने की आवश्यकता जताई गई है।
स्थानीय प्रशासन को अब इस रिपोर्ट के आधार पर अपनी रणनीति तैयार करने की जरूरत है। घाटी में रहने वाले परिवारों की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए संभावित आपदा प्रबंधन योजनाओं पर विचार किया जा रहा है।
फिलहाल, दारमा घाटी के निवासियों के बीच इस रिपोर्ट को लेकर चिंता का माहौल है। भूस्खलन का खतरा न केवल उनके घरों के लिए, बल्कि उनकी आजीविका और आवागमन के साधनों के लिए भी एक बड़ा संकट बनकर सामने आया है।