कर्नाटक सरकार ने तुलु भाषा को दी आधिकारिक मान्यता, दशकों पुरानी मांग हुई पूरी
तटीय कर्नाटक में व्यापक रूप से बोली जाने वाली तुलु भाषा को राज्य सरकार ने दूसरी अतिरिक्त आधिकारिक भाषा के रूप में मान्यता दे दी है। मुख्यमंत्री डी.के. शिवकुमार के नेतृत्व में लिए गए इस निर्णय से स्थानीय समुदाय की लंबे समय से चली आ रही मांग पूरी हो गई है। यह कदम राजनीतिक रूप से महत्वपूर्ण माना जा रहा है क्योंकि तुलु भाषी क्षेत्र पारंपरिक रूप से भाजपा के समर्थक रहे हैं।
VIMARSHNAARAD TVकर्नाटक सरकार ने तटीय क्षेत्र में बोली जाने वाली तुलु भाषा को राज्य की दूसरी अतिरिक्त आधिकारिक भाषा का दर्जा प्रदान कर दिया है। मुख्यमंत्री डी.के. शिवकुमार के नेतृत्व में लिए गए इस फैसले की जानकारी आज तक की रिपोर्ट में दी गई है। इस निर्णय के साथ ही तुलु भाषी लोगों की दशकों पुरानी मांग को पूरा कर दिया गया है।
तुलु भाषा को आधिकारिक मान्यता मिलने से स्थानीय लोगों में काफी उत्साह है। यह भाषा तटीय कर्नाटक के विभिन्न हिस्सों में बड़े पैमाने पर बोली जाती है। लंबे समय से इस क्षेत्र के लोग अपनी भाषा को संवैधानिक या आधिकारिक संरक्षण देने की मांग कर रहे थे।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह निर्णय काफी महत्वपूर्ण है। तटीय कर्नाटक का क्षेत्र पारंपरिक रूप से भारतीय जनता पार्टी का गढ़ रहा है और वहां के मतदाता पार्टी के प्रति वफादार माने जाते हैं। ऐसे में कांग्रेस सरकार का यह कदम एक बड़ी राजनीतिक पहल के रूप में देखा जा रहा है।
भाजपा ने भी पूर्व में तुलु भाषा को मान्यता देने का वादा किया था। अब मुख्यमंत्री शिवकुमार की सरकार ने इस वादे को पूरा करते हुए इसे आधिकारिक दर्जा दे दिया है। इस कदम से राज्य में भाषाई पहचान को और मजबूती मिलने की उम्मीद है।
तुलु भाषी समुदाय लंबे समय से अपनी संस्कृति और भाषा के संरक्षण के लिए संघर्ष कर रहा था। सरकार के इस फैसले को उनकी सांस्कृतिक अस्मिता की जीत के तौर पर देखा जा रहा है।
आधिकारिक अधिसूचना के बाद अब तुलु भाषा को सरकारी कामकाज और अन्य प्रशासनिक कार्यों में भी उचित स्थान मिल सकेगा। इससे भाषा के विकास और प्रचार-प्रसार के लिए नए रास्ते खुलेंगे।
यह निर्णय राज्य की भाषाई विविधता को संरक्षित करने की दिशा में एक बड़ा कदम है। सरकार की इस पहल से तटीय कर्नाटक के लोगों की लंबे समय से चली आ रही उपेक्षा की भावना भी दूर होने की संभावना है।