क्रिमिनल ट्राइब्स एक्ट के कलंक से मुक्ति के 74 साल बाद भी संघर्ष जारी
ब्रिटिश शासन के दौरान 1871 में लागू किए गए 'क्रिमिनल ट्राइब्स एक्ट' ने कई समुदायों को सामूहिक रूप से अपराधी करार दिया था। उस समय स्थायी पता और जमीन को सभ्य जीवन का पैमाना माना जाता था, जिससे खानाबदोश समुदायों को हाशिए पर धकेल दिया गया। आजादी के 74 साल बाद भी इन समुदायों को सामाजिक सम्मान और पहचान पाने के लिए संघर्ष करना पड़ रहा है।
VIMARSHNAARAD TVब्रिटिश शासन के दौर में भारत में जीवन जीने के कुछ मानक तय किए गए थे। उस समय एक स्थायी गांव, जमीन का मालिकाना हक और एक निश्चित पता होना 'सभ्य' जीवन की पहचान माना जाता था। इसी विचारधारा के तहत 1871 में 'क्रिमिनल ट्राइब्स एक्ट' लाया गया था।
इस कानून ने कई खानाबदोश समुदायों को सामूहिक रूप से अपराध से जोड़ दिया। इन समुदायों को जन्मजात अपराधी मान लिया गया, जिससे उन्हें समाज में भारी भेदभाव और तिरस्कार का सामना करना पड़ा। यह कलंक उनकी पहचान का हिस्सा बन गया था।
आजादी के बाद इस कानून को हटाए हुए 74 साल बीत चुके हैं, लेकिन इन समुदायों की स्थिति में बहुत अधिक बदलाव नहीं आया है। आज भी इन समुदायों के लोग अपनी खोई हुई इज्जत और सामाजिक सम्मान पाने के लिए संघर्ष कर रहे हैं।
इतिहासकारों का मानना है कि ब्रिटिश शासन की यह नीति इन समुदायों को मुख्यधारा से अलग करने की एक सोची-समझी साजिश थी। खानाबदोश जीवनशैली को अपराध के रूप में देखना उनकी संस्कृति और परंपराओं पर एक बड़ा प्रहार था।
वर्तमान में भी इन समुदायों के सामने शिक्षा, रोजगार और सामाजिक सुरक्षा की बड़ी चुनौतियां हैं। सरकारी प्रयासों के बावजूद, समाज में व्याप्त पूर्वाग्रहों के कारण उन्हें अपनी पहचान साबित करने के लिए लगातार जद्दोजहद करनी पड़ती है।
इन समुदायों के लिए अब लड़ाई केवल कानूनी अधिकारों की नहीं, बल्कि मानवीय गरिमा की भी है। वे चाहते हैं कि समाज उन्हें अपराधी की नजर से देखना बंद करे और उन्हें एक समान नागरिक के रूप में स्वीकार करे।
यह संघर्ष बताता है कि कानून बदलने से सामाजिक मानसिकता बदलना कितना कठिन है। 74 साल बाद भी इन समुदायों की कहानी हमें याद दिलाती है कि न्याय और समानता का सफर अभी अधूरा है।