ग्रेटर नोएडा में गांधी जयंती पर सवर्ण समाज का मौन व्रत, राष्ट्रपति को सौंपा ज्ञापन
महात्मा गांधी जयंती के अवसर पर ग्रेटर नोएडा में सवर्ण समाज ने यूजीसी रोलबैक की मांग को लेकर मौन व्रत रखा। शुक्रवार सुबह राष्ट्रगान के साथ शुरू हुआ यह प्रदर्शन दोपहर एक बजे तक चला। प्रदर्शनकारियों ने शांतिपूर्ण तरीके से अपनी बात रखी और अंत में राष्ट्रपति के नाम एक ज्ञापन सौंपा।
VIMARSHNAARAD TVमहात्मा गांधी की जयंती के पावन अवसर पर ग्रेटर नोएडा में एक अनूठा प्रदर्शन देखने को मिला। सवर्ण समाज के लोगों ने यूजीसी रोलबैक की मांग को लेकर मौन व्रत का आयोजन किया। एनडीटीवी इंडिया की रिपोर्ट के अनुसार, यह कार्यक्रम शुक्रवार सुबह करीब 10 बजे राष्ट्रगान के साथ शुरू हुआ।
प्रदर्शनकारी निर्धारित स्थान पर शांतिपूर्वक बैठे रहे और उन्होंने अपनी मांगों को सरकार तक पहुंचाने का प्रयास किया। मौन व्रत के माध्यम से उन्होंने अपनी असहमति और चिंताएं व्यक्त कीं। इस दौरान किसी भी प्रकार का शोर-शराबा नहीं हुआ और पूरा कार्यक्रम अनुशासित तरीके से संपन्न हुआ।
दोपहर करीब एक बजे मौन व्रत समाप्त किया गया। इस दौरान प्रदर्शनकारियों ने अपनी मांगों को लेकर राष्ट्रपति के नाम एक ज्ञापन भी सौंपा। ज्ञापन में यूजीसी से संबंधित विभिन्न मुद्दों और सवर्ण समाज की चिंताओं का उल्लेख किया गया है।
स्थानीय प्रशासन और सुरक्षा एजेंसियां भी इस दौरान सतर्क रहीं। प्रदर्शनकारियों ने शांतिपूर्ण तरीके से अपनी बात रखने के लिए इस दिन को चुना, जो गांधीवादी मूल्यों के अनुरूप था। कार्यक्रम में शामिल लोगों ने कहा कि वे अपनी मांगों को लेकर गंभीर हैं और सरकार से उचित कार्रवाई की उम्मीद करते हैं।
इस प्रदर्शन का मुख्य उद्देश्य यूजीसी की नीतियों में बदलाव की मांग करना था। सवर्ण समाज के प्रतिनिधियों ने बताया कि वे लंबे समय से अपनी चिंताओं को लेकर आवाज उठा रहे हैं। राष्ट्रपति को ज्ञापन सौंपकर उन्होंने अपनी बात को उच्च स्तर तक पहुंचाने का प्रयास किया है।
ग्रेटर नोएडा के विभिन्न हिस्सों से लोग इस मौन व्रत में शामिल होने के लिए पहुंचे थे। प्रदर्शनकारियों का कहना था कि वे शांतिपूर्ण तरीके से अपनी बात रखने में विश्वास रखते हैं। कार्यक्रम के समापन के बाद सभी लोग शांतिपूर्वक अपने गंतव्य की ओर रवाना हो गए।
इस घटना ने स्थानीय स्तर पर चर्चाओं को जन्म दिया है। प्रशासन अब ज्ञापन में दी गई मांगों का अध्ययन करेगा। सवर्ण समाज के इस कदम को एक लोकतांत्रिक तरीके से विरोध दर्ज कराने के प्रयास के रूप में देखा जा रहा है।