‘घमासान’ फिल्म समीक्षा: भटकी हुई कहानी में उलझी फिल्म, अरशद वारसी और प्रतीक गांधी का टैलेंट बर्बाद
निर्देशक तिग्मांशु धूलिया की नई फिल्म ‘घमासान’ दर्शकों की उम्मीदों पर खरी नहीं उतर पाई है। अरशद वारसी और प्रतीक गांधी जैसे मंझे हुए कलाकारों के बावजूद, फिल्म की कमजोर पटकथा और भटकी हुई कहानी ने इसे एक औसत अनुभव बना दिया है। बुंदेलखंड और डकैतों की पृष्ठभूमि पर आधारित यह फिल्म अपने मुख्य उद्देश्य से भटकती नजर आती है।
VIMARSHNAARAD TVनिर्देशक तिग्मांशु धूलिया अपनी विशिष्ट शैली के लिए जाने जाते हैं, जो अक्सर बीहड़ के डकैतों और उत्तर प्रदेश-बुंदेलखंड की राजनीति के इर्द-गिर्द घूमती है। उनकी नवीनतम फिल्म ‘घमासान’ में भी उन्होंने इन्हीं तत्वों को पिरोने की कोशिश की है। हालांकि, इस बार फिल्म की कहानी अपनी दिशा खोती हुई प्रतीत होती है, जिससे दर्शकों को निराशा हाथ लगी है।
फिल्म में अरशद वारसी और प्रतीक गांधी जैसे बेहतरीन अभिनेताओं को मुख्य भूमिकाओं में लिया गया है। इन कलाकारों ने अपने किरदारों को निभाने में कोई कसर नहीं छोड़ी है, लेकिन पटकथा की कमजोरियां उनके अभिनय के प्रभाव को कम कर देती हैं। ऐसा लगता है कि फिल्म का लेखन उन ऊंचाइयों तक नहीं पहुंच पाया, जिसकी उम्मीद तिग्मांशु धूलिया के पिछले कार्यों से की जाती थी।
कहानी का ताना-बाना बुंदेलखंड के परिवेश और डकैतों के जीवन के संघर्षों को दर्शाने के लिए बुना गया था। लेकिन फिल्म के दौरान कई ऐसे मोड़ आते हैं जो कहानी के मुख्य प्रवाह से मेल नहीं खाते। पटकथा में बिखराव के कारण दर्शक फिल्म के साथ भावनात्मक रूप से जुड़ नहीं पाते हैं, जो एक गंभीर फिल्म के लिए बड़ी चुनौती है।
फिल्म के संवाद और दृश्यों में वह गहराई नहीं दिखती जो धूलिया की पिछली फिल्मों की पहचान रही है। अरशद वारसी और प्रतीक गांधी का टैलेंट इस फिल्म में पूरी तरह से उपयोग नहीं हो पाया है। उनके अभिनय के बावजूद, फिल्म का कमजोर निर्देशन और पटकथा इसे एक औसत दर्जे की फिल्म बनाकर छोड़ देते हैं।
जी-5 पर रिलीज हुई यह फिल्म उन लोगों के लिए एक सबक है जो केवल बड़े नामों के भरोसे फिल्म का निर्माण करते हैं। फिल्म की तकनीकी पक्ष और सिनेमैटोग्राफी ठीक होने के बावजूद, कहानी का अभाव इसे एक कमजोर कड़ी बनाता है। दर्शकों को इस फिल्म से काफी उम्मीदें थीं, लेकिन यह उन पर खरा उतरने में विफल रही है।
कुल मिलाकर, ‘घमासान’ एक ऐसी फिल्म है जो अपने विषय के साथ न्याय नहीं कर पाती। यदि आप तिग्मांशु धूलिया की पिछली फिल्मों के प्रशंसक हैं, तो यह फिल्म आपको निराश कर सकती है। अरशद और प्रतीक के प्रशंसक शायद उनके अभिनय को देखने के लिए इसे एक बार देख सकते हैं, लेकिन एक संपूर्ण सिनेमाई अनुभव के रूप में यह फिल्म काफी पीछे रह जाती है।