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प्रयागराज: 21 साल पुरानी तलाक की डिक्री को चुनौती देने पर हाईकोर्ट का सख्त रुख

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया है कि 21 साल बाद एकपक्षीय तलाक की डिक्री को चुनौती देने पर केवल आवेदन दाखिल करना पर्याप्त नहीं है। अमर उजाला की रिपोर्ट के अनुसार, अदालत ने कहा कि देरी को माफ करने के लिए ठोस और पर्याप्त कारण बताना अनिवार्य है। बिना उचित आधार के इतने लंबे समय बाद डिक्री को रद्द नहीं किया जा सकता।

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण कानूनी टिप्पणी करते हुए कहा है कि तलाक की डिक्री को चुनौती देने में हुई अत्यधिक देरी को हल्के में नहीं लिया जा सकता। अदालत ने स्पष्ट किया कि यदि कोई पक्ष 21 साल बाद एकपक्षीय तलाक की डिक्री को चुनौती देता है, तो केवल आवेदन दाखिल कर देने से देरी स्वतः माफ नहीं मानी जाएगी।

अमर उजाला नेटवर्क, प्रयागराज की रिपोर्ट के अनुसार, मामले की सुनवाई के दौरान अदालत ने इस बात पर जोर दिया कि कानूनी प्रक्रिया में समय सीमा का पालन करना आवश्यक है। इतने लंबे अंतराल के बाद डिक्री को रद्द करने के लिए याचिकाकर्ता को देरी के पीछे के ठोस और पर्याप्त कारण प्रस्तुत करने होंगे।

अदालत का मानना है कि न्याय प्रणाली में निश्चितता का महत्व है। यदि किसी डिक्री को दो दशक से अधिक समय बीत चुका है, तो उसे चुनौती देने के लिए असाधारण परिस्थितियों का होना जरूरी है। बिना किसी ठोस आधार के देरी को माफ करना कानूनी सिद्धांतों के विपरीत होगा।

यह मामला उन लोगों के लिए एक सबक है जो कानूनी विवादों में देरी से कार्रवाई करते हैं। हाईकोर्ट ने यह स्पष्ट कर दिया है कि देरी माफी के लिए केवल औपचारिकता पूरी करना काफी नहीं है, बल्कि अदालत को संतुष्ट करना अनिवार्य है।

कानूनी जानकारों के अनुसार, इस निर्णय से अदालतों में लंबित पुराने मामलों के निपटारे में स्पष्टता आएगी। यह व्यवस्था सुनिश्चित करती है कि कोई भी पक्ष बिना किसी वैध कारण के लंबे समय बाद पुराने फैसलों को चुनौती देकर कानूनी प्रक्रिया का दुरुपयोग न कर सके।

अदालत ने अपने आदेश में यह भी संकेत दिया कि देरी के लिए दिए गए कारणों की गहन जांच की जाएगी। यदि कारण पर्याप्त नहीं पाए जाते हैं, तो याचिका को खारिज कर दिया जाएगा।

यह फैसला उन सभी के लिए एक महत्वपूर्ण मिसाल है जो पारिवारिक विवादों या तलाक के मामलों में देरी से कानूनी कदम उठाते हैं। अब से, देरी माफी के आवेदनों पर अदालतें और अधिक सतर्कता बरतेंगी।

अंततः, इलाहाबाद हाईकोर्ट का यह रुख कानूनी समय सीमा के महत्व को रेखांकित करता है। न्याय पाने के लिए समय पर कदम उठाना और देरी के लिए ठोस तर्क देना अनिवार्य है।

स्रोत

मूल संदर्भ

01अमर उजाला नेटवर्क, प्रयागराजमूल रिपोर्ट देखें ↗