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बीबीसी पड़ताल: भारत की कई 'पेपर पार्टियां' चुनावी राजनीति से दूर रहकर भी बटोर रही हैं करोड़ों का चंदा

बीबीसी की एक जांच में सामने आया है कि भारत में ऐसी कई राजनीतिक पार्टियां सक्रिय हैं जो चुनाव तो बमुश्किल लड़ती हैं, लेकिन उन्हें करोड़ों रुपये का चंदा प्राप्त होता है। कुछ मामलों में इन पार्टियों को मिलने वाली राशि राष्ट्रीय दलों से भी अधिक रही है, जबकि चुनावी मैदान में इनका कोई खास प्रभाव या उपस्थिति नहीं दिखती।

बीबीसी की एक हालिया पड़ताल ने भारतीय राजनीति के एक अनूठे पहलू को उजागर किया है। जांच में पता चला है कि देश में कई ऐसी राजनीतिक पार्टियां मौजूद हैं जिन्हें 'पेपर पार्टियां' कहा जा सकता है। ये दल चुनावी राजनीति में सक्रिय रूप से भाग नहीं लेते, लेकिन उन्हें भारी मात्रा में चंदा मिलता है।

पड़ताल के दौरान बीबीसी की टीम ने पाया कि इन पार्टियों को मिलने वाली चंदे की राशि सैकड़ों करोड़ रुपये तक पहुंच गई है। यह स्थिति तब है जब ये दल चुनाव लड़ने के मामले में लगभग नदारद ही रहते हैं।

आश्चर्यजनक रूप से, कुछ मामलों में इन छोटी पार्टियों को प्राप्त चंदा बड़े राष्ट्रीय दलों को मिलने वाले चंदे से भी अधिक पाया गया। यह वित्तीय विसंगति राजनीतिक फंडिंग के पारदर्शी होने पर सवाल खड़े करती है।

रिपोर्ट के अनुसार, इन पार्टियों का चुनावी प्रदर्शन बेहद सीमित रहा है। वे न तो बड़े पैमाने पर उम्मीदवार उतारती हैं और न ही चुनावी रैलियों या प्रचार में सक्रिय दिखती हैं।

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि इस तरह की फंडिंग का पैटर्न चुनावी प्रक्रिया की शुचिता के लिए चिंता का विषय हो सकता है। चंदे का यह प्रवाह बिना किसी स्पष्ट चुनावी गतिविधि के हो रहा है।

बीबीसी की टीम ने इन आंकड़ों का विश्लेषण किया है, जिससे पता चलता है कि चंदा देने वाले और लेने वाले दोनों ही पक्षों की भूमिका संदिग्ध हो सकती है। हालांकि, इन पार्टियों का पंजीकरण वैध है, लेकिन उनकी कार्यप्रणाली केवल कागजों तक ही सीमित है।

यह पड़ताल उन नियमों और कानूनों पर भी सवाल उठाती है जो राजनीतिक दलों को चंदा प्राप्त करने की अनुमति देते हैं। क्या ये पार्टियां केवल चंदे को वैध बनाने का जरिया बन गई हैं, यह एक बड़ा प्रश्न है।

इस मामले पर संबंधित अधिकारियों या पार्टियों की ओर से कोई विस्तृत स्पष्टीकरण अभी तक सामने नहीं आया है। बीबीसी की यह रिपोर्ट चुनावी फंडिंग के उस अंधेरे कोने को दिखाती है जिस पर अक्सर चर्चा नहीं होती।

स्रोत

मूल संदर्भ

01BBC News हिंदीमूल रिपोर्ट देखें ↗