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भदोही का नाम बदलकर संत रविदास नगर: उत्तर प्रदेश की राजनीति में दलित वोट बैंक का महत्व

उत्तर प्रदेश के भदोही जिले का नाम बदलकर संत रविदास नगर कर दिया गया है। राज्य में 22 फीसदी दलित आबादी है, जो सभी राजनीतिक दलों के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है। बसपा का जनाधार खिसकने के बीच, भाजपा इस बदलाव के जरिए दलित मतदाताओं को लुभाने की कोशिश कर रही है। पिछले 32 वर्षों में जिले का नाम पांच बार बदला गया है।

उत्तर प्रदेश में भदोही जिले का नाम बदलकर संत रविदास नगर किए जाने के बाद से राजनीतिक गलियारों में चर्चा तेज हो गई है। राज्य की राजनीति में दलित वोट बैंक हमेशा से ही निर्णायक भूमिका निभाता रहा है। उत्तर प्रदेश में दलितों की आबादी लगभग 22 फीसदी है, जिसे साधने के लिए सभी प्रमुख दल अपनी-अपनी रणनीति अपना रहे हैं।

राजनीतिक जानकारों का मानना है कि इस नाम परिवर्तन के पीछे एक गहरी सियासी मंशा है। बहुजन समाज पार्टी (बसपा) की सुप्रीमो मायावती ने इसी दलित वोट बैंक के दम पर चार बार मुख्यमंत्री की कुर्सी तक का सफर तय किया था। हालांकि, पिछले कुछ चुनावों में बसपा का जनाधार कमजोर हुआ है।

भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) इस स्थिति का लाभ उठाने की कोशिश में है। पार्टी का मानना है कि अगर बसपा का वोट बैंक बिखरता है, तो उसे अपने पाले में लाकर 2027 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनावों में बड़ी जीत हासिल की जा सकती है। संत रविदास के नाम पर जिले का नामकरण इसी दिशा में एक बड़ा कदम माना जा रहा है।

भदोही के नाम बदलने का इतिहास भी काफी लंबा रहा है। पिछले 32 वर्षों में इस जिले का नाम पांच बार बदला गया है, जो स्थानीय राजनीति में बदलाव के साथ-साथ प्रशासनिक फेरबदल को भी दर्शाता है। हर बार नाम बदलने के पीछे अलग-अलग राजनीतिक तर्क दिए गए हैं।

दलित समुदाय के बीच संत रविदास का नाम बहुत सम्मान के साथ लिया जाता है। ऐसे में इस बदलाव को दलितों के प्रति सम्मान और उनके समर्थन को हासिल करने की कोशिश के रूप में देखा जा रहा है। विपक्षी दल इसे केवल चुनावी हथकंडा करार दे रहे हैं।

राज्य की राजनीति में दलित वोट बैंक को लेकर चल रही यह खींचतान 2027 के चुनावों तक और तेज होने की संभावना है। भाजपा जहां अपनी पैठ मजबूत करने में लगी है, वहीं अन्य दल भी अपने पुराने वोट बैंक को बचाने की कवायद कर रहे हैं।

आने वाले समय में यह देखना दिलचस्प होगा कि क्या यह नाम परिवर्तन भाजपा को दलित मतदाताओं के करीब लाने में सफल होता है या नहीं। फिलहाल, यह मुद्दा उत्तर प्रदेश की राजनीति में एक नई बहस का केंद्र बन गया है।

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