मद्रास हाई कोर्ट की मीडिया को नसीहत: टीआरपी की दौड़ से ऊपर है गरिमा और निजता
मद्रास हाई कोर्ट ने आर. वीरमणि से संबंधित पॉक्सो मामले में टीवी चैनलों द्वारा संवेदनशील वीडियो प्रसारित करने पर कड़ी नाराजगी जताई है। अदालत ने स्पष्ट किया कि मीडिया को टीआरपी की अंधी दौड़ में शामिल होने के बजाय मानवीय गरिमा और कानून का सम्मान करना चाहिए। न्यायाधीशों ने कहा कि न्याय प्रक्रिया की शुचिता बनाए रखना मीडिया की भी जिम्मेदारी है और उन्हें अपनी सीमाओं का उल्लंघन नहीं करना चाहिए।
VIMARSHNAARAD TVमद्रास हाई कोर्ट ने हाल ही में एक महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए मीडिया संस्थानों को अपनी जिम्मेदारी का अहसास कराया है। आर. वीरमणि से जुड़े पॉक्सो मामले की सुनवाई के दौरान अदालत ने टीवी चैनलों द्वारा प्रसारित किए गए कुछ वीडियो पर गंभीर आपत्ति जताई। अदालत का मानना है कि मीडिया को सनसनी फैलाने के बजाय पीड़ित की निजता और कानूनी मर्यादाओं का ध्यान रखना चाहिए।
न्यायाधीशों ने सुनवाई के दौरान कहा कि टीआरपी की होड़ में शामिल होकर मीडिया अक्सर उन सीमाओं को लांघ जाता है जो कानून और नैतिकता द्वारा तय की गई हैं। अदालत ने जोर देकर कहा कि समाज में टीआरपी से कहीं अधिक महत्वपूर्ण चीजें हैं, जिनमें व्यक्ति की गरिमा और न्याय प्रक्रिया की निष्पक्षता सर्वोपरि है।
बीबीसी हिंदी की रिपोर्ट के अनुसार, अदालत ने मीडिया को चेतावनी दी कि वे किसी भी मामले की रिपोर्टिंग करते समय बेहद सावधानी बरतें। पॉक्सो जैसे संवेदनशील मामलों में पीड़ितों की पहचान उजागर करना या भ्रामक फुटेज दिखाना न केवल गैर-कानूनी है, बल्कि यह समाज पर भी बुरा असर डालता है।
अदालत ने मीडिया घरानों को याद दिलाया कि वे लोकतंत्र का चौथा स्तंभ हैं और उनसे अपेक्षा की जाती है कि वे जिम्मेदारी के साथ काम करें। किसी भी मामले में जल्दबाजी में रिपोर्टिंग करना या टीआरपी बढ़ाने के लिए संवेदनशील सामग्री का उपयोग करना न्याय के हित में नहीं है।
न्यायिक टिप्पणी में यह भी स्पष्ट किया गया कि मीडिया को यह समझना चाहिए कि अदालत की कार्यवाही और जांच की अपनी एक प्रक्रिया होती है। मीडिया द्वारा की गई अनावश्यक दखलंदाजी या सनसनीखेज प्रस्तुति से जांच प्रभावित हो सकती है।
अंत में, अदालत ने मीडिया संस्थानों से आग्रह किया कि वे अपनी संपादकीय नीतियों की समीक्षा करें। न्यायपालिका ने स्पष्ट संकेत दिए हैं कि यदि मीडिया अपनी लक्ष्मण रेखा पार करता है, तो उसे कानूनी परिणामों का सामना करना पड़ सकता है। यह टिप्पणी मीडिया जगत के लिए एक कड़ा संदेश है कि वे अपनी व्यावसायिक महत्वाकांक्षाओं को मानवीय मूल्यों से ऊपर न रखें।