लखनऊ: केजीएमयू के एसोसिएट प्रोफेसर पर गंभीर आरोप, निजी अस्पताल भेजने के बाद मरीज की मौत
उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ स्थित केजीएमयू के नेफ्रोलॉजी विभाग के एक एसोसिएट प्रोफेसर पर गंभीर आरोप लगे हैं। बताया गया है कि उन्होंने एक मरीज को बेहतर उपचार का आश्वासन देकर निजी अस्पताल में स्थानांतरित करवाया था, जहां इलाज के दौरान मरीज ने दम तोड़ दिया। इस घटना के बाद से चिकित्सा जगत में हड़कंप मचा है और मामले की जांच की मांग उठ रही है।

लखनऊ के प्रतिष्ठित किंग जॉर्ज मेडिकल यूनिवर्सिटी (केजीएमयू) से एक बेहद संवेदनशील मामला सामने आया है। अमर उजाला की रिपोर्ट के अनुसार, संस्थान के नेफ्रोलॉजी विभाग में कार्यरत एक एसोसिएट प्रोफेसर पर एक मरीज को गुमराह करने का आरोप लगा है। पीड़ित परिवार का दावा है कि डॉक्टर ने बेहतर इलाज का भरोसा दिलाकर मरीज को केजीएमयू से हटाकर एक निजी अस्पताल में भर्ती कराया था।
दुर्भाग्यवश, निजी अस्पताल में ले जाए जाने के कुछ समय बाद ही मरीज की मृत्यु हो गई। इस घटना ने स्वास्थ्य सेवाओं की विश्वसनीयता पर सवाल खड़े कर दिए हैं। परिजनों का आरोप है कि यदि मरीज को सरकारी संस्थान में ही रखा जाता, तो शायद परिणाम अलग हो सकते थे। निजी अस्पताल में हुई इस मौत के बाद से परिवार गहरे सदमे में है।
इस मामले ने चिकित्सा क्षेत्र में चल रहे निजीकरण और सरकारी डॉक्टरों की भूमिका पर बहस छेड़ दी है। आमतौर पर केजीएमयू जैसे बड़े संस्थानों में इलाज के लिए आने वाले लोग डॉक्टरों पर पूर्ण भरोसा करते हैं। ऐसे में किसी वरिष्ठ चिकित्सक द्वारा मरीज को बाहर भेजने की सलाह देना गंभीर चिंता का विषय माना जा रहा है।
फिलहाल इस मामले में आधिकारिक तौर पर विस्तृत जांच की प्रक्रिया शुरू होने की प्रतीक्षा है। अस्पताल प्रशासन की ओर से अभी तक इस घटना पर कोई व्यापक बयान जारी नहीं किया गया है। हालांकि, इस तरह की घटनाओं से सरकारी अस्पतालों की छवि पर असर पड़ना स्वाभाविक है।
पीड़ित पक्ष ने इस पूरे घटनाक्रम की निष्पक्ष जांच की मांग की है ताकि यह स्पष्ट हो सके कि मरीज को निजी अस्पताल भेजने के पीछे क्या वास्तविक कारण थे। क्या यह चिकित्सकीय निर्णय था या इसके पीछे कोई अन्य स्वार्थ छिपा था, यह जांच के बाद ही पता चलेगा।
चिकित्सा विशेषज्ञों का मानना है कि सरकारी अस्पतालों के डॉक्टरों को मरीजों की सुरक्षा और उनके हितों को सर्वोपरि रखना चाहिए। किसी भी मरीज को निजी संस्थान में रेफर करने के लिए ठोस चिकित्सकीय आधार होना अनिवार्य है। इस मामले में नियमों का पालन हुआ या नहीं, यह जांच का मुख्य बिंदु होगा।
आने वाले दिनों में इस मामले पर प्रशासन क्या कदम उठाता है, इस पर सभी की निगाहें टिकी हैं। केजीएमयू प्रबंधन के लिए यह एक बड़ी चुनौती है कि वे अपने संस्थान की साख को बचाए रखें और दोषी पाए जाने पर सख्त कार्रवाई सुनिश्चित करें।
