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लखनऊ: बेटे की जान बचाने के लिए 150 किलोमीटर दौड़ी मां, अस्पतालों की बेरुखी से हुई मौत

लखीमपुर से लखनऊ तक अपने बीमार बेटे के उपचार के लिए एक मां ने 150 किलोमीटर की लंबी दूरी तय की। अमर उजाला की रिपोर्ट के अनुसार, लखनऊ पहुंचने पर उसे एक से दूसरे अस्पताल के चक्कर काटने पड़े, लेकिन समय पर उचित चिकित्सा न मिल पाने के कारण अंततः उसके बेटे की मृत्यु हो गई। स्वास्थ्य व्यवस्था की इस विफलता ने एक मां के संघर्ष को व्यर्थ कर दिया।

उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ में स्वास्थ्य सेवाओं की एक दुखद तस्वीर सामने आई है, जहां एक मां अपने बेटे को बचाने की उम्मीद में लखीमपुर से 150 किलोमीटर का सफर तय करके पहुंची थी। अमर उजाला की रिपोर्ट के मुताबिक, यह महिला अपने बच्चे के गंभीर इलाज के लिए लखनऊ आई थी, लेकिन शहर के अस्पतालों में उसे केवल निराशा ही हाथ लगी।

रिपोर्ट में बताया गया है कि अस्पताल पहुंचने के बाद मां को अपने बच्चे के उपचार के लिए एक केंद्र से दूसरे केंद्र तक दौड़ना पड़ा। इस दौरान उसे कहीं भी समय पर उचित चिकित्सा सुविधा उपलब्ध नहीं हो सकी। एक मां की यह जद्दोजहद अंततः विफल रही और अस्पताल की चौखट पर ही उसके बेटे ने दम तोड़ दिया।

इस घटना ने सार्वजनिक स्वास्थ्य प्रणाली की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। एक मां जो अपने बच्चे की सांसें बचाने के लिए मीलों का सफर तय कर सकती है, वह शहर के भीतर अस्पतालों के बीच भटकने को मजबूर हो गई। यह स्थिति व्यवस्था की संवेदनहीनता को दर्शाती है।

अमर उजाला के अनुसार, महिला ने अपने बेटे के जीवन के लिए हर संभव प्रयास किया। उसने हार नहीं मानी और एक अस्पताल से दूसरे अस्पताल तक मदद की गुहार लगाती रही। हालांकि, चिकित्सा तंत्र की लेटलतीफी और संसाधनों की कमी के कारण उसे अपने बच्चे को खोना पड़ा।

यह मामला न केवल एक परिवार की त्रासदी है, बल्कि यह उन लोगों की पीड़ा को भी उजागर करता है जो सुदूर क्षेत्रों से बेहतर इलाज की उम्मीद में बड़े शहरों का रुख करते हैं। अक्सर ऐसे मरीजों को अस्पतालों के बीच चक्कर काटने पड़ते हैं, जिससे उनकी स्थिति और अधिक बिगड़ जाती है।

इस दुखद घटना के बाद स्थानीय स्तर पर स्वास्थ्य सेवाओं की गुणवत्ता और मरीजों के प्रति व्यवहार को लेकर चर्चाएं तेज हो गई हैं। लोगों का कहना है कि यदि समय रहते इलाज मिल जाता, तो शायद बच्चे की जान बचाई जा सकती थी।

फिलहाल, इस मामले ने पूरे क्षेत्र में शोक की लहर पैदा कर दी है। एक मां का संघर्ष जो उम्मीद के साथ शुरू हुआ था, वह व्यवस्था की विफलता के कारण एक गहरे दुख में बदल गया। यह घटना स्वास्थ्य विभाग के दावों और जमीनी हकीकत के बीच के अंतर को स्पष्ट करती है।

स्रोत

मूल संदर्भ

01अमर उजाला नेटवर्क, लखनऊमूल रिपोर्ट देखें ↗