लखनऊ: वेंटिलेटर न मिलने से नवजात ने तोड़ा दम, हाईकोर्ट ने अधिकारियों को तलब कर दिए जांच के निर्देश
सुल्तानपुर के सरकारी मेडिकल कॉलेज से लखनऊ रेफर किए गए एक नवजात शिशु की वेंटिलेटर सुविधा न मिलने के कारण दुखद मृत्यु हो गई। इस मामले को गंभीरता से लेते हुए इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ बेंच ने संबंधित अधिकारियों को कड़ी फटकार लगाई है। अदालत ने घटना की विस्तृत जांच के आदेश दिए हैं ताकि भविष्य में ऐसी लापरवाही को रोका जा सके और स्वास्थ्य सेवाओं में सुधार सुनिश्चित किया जा सके।

उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ में स्वास्थ्य व्यवस्था की एक बड़ी लापरवाही सामने आई है। सुल्तानपुर के सरकारी मेडिकल कॉलेज से एक नवजात शिशु को गंभीर हालत में लखनऊ रेफर किया गया था। परिजनों का आरोप है कि अस्पताल में समय पर वेंटिलेटर उपलब्ध नहीं हो सका, जिसके कारण बच्चे की जान चली गई। इस घटना ने सरकारी अस्पतालों में बुनियादी सुविधाओं के अभाव पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।
मामले की गंभीरता को देखते हुए इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ बेंच ने स्वतः संज्ञान लिया है। अदालत ने इस घटना पर गहरी नाराजगी व्यक्त करते हुए संबंधित अधिकारियों को कड़ी फटकार लगाई है। सुनवाई के दौरान कोर्ट ने स्पष्ट किया कि नवजात की मृत्यु के मामले में किसी भी स्तर पर हुई लापरवाही को बर्दाश्त नहीं किया जाएगा।
अदालत ने मामले की निष्पक्ष और विस्तृत जांच के आदेश दिए हैं। कोर्ट ने अधिकारियों से पूछा है कि आखिर किस परिस्थिति में नवजात को वेंटिलेटर जैसी जीवन रक्षक सुविधा नहीं मिल पाई। इस जांच के जरिए यह पता लगाने का प्रयास किया जाएगा कि क्या यह संसाधनों की कमी थी या फिर अस्पताल प्रशासन की ओर से कोई चूक हुई है।
अमर उजाला की रिपोर्ट के अनुसार, हाईकोर्ट ने इस मामले में जवाबदेही तय करने के निर्देश दिए हैं। अदालत ने यह भी सुनिश्चित करने को कहा है कि जांच रिपोर्ट जल्द से जल्द पेश की जाए। इस घटना के बाद स्वास्थ्य विभाग में हड़कंप मचा हुआ है और प्रशासनिक स्तर पर जवाब देने की तैयारी की जा रही है।
यह मामला न केवल एक परिवार के लिए व्यक्तिगत त्रासदी है, बल्कि सार्वजनिक स्वास्थ्य प्रणाली की खामियों को भी उजागर करता है। सुल्तानपुर से लखनऊ तक की यात्रा के दौरान बच्चे की स्थिति नाजुक थी, लेकिन लखनऊ पहुंचने के बाद भी उसे जरूरी इलाज न मिलना सिस्टम की विफलता को दर्शाता है।
अब सभी की निगाहें हाईकोर्ट द्वारा गठित जांच समिति की रिपोर्ट पर टिकी हैं। उम्मीद की जा रही है कि इस मामले में सख्त कार्रवाई होगी ताकि भविष्य में किसी अन्य बच्चे को ऐसी स्थिति का सामना न करना पड़े। स्वास्थ्य विभाग के वरिष्ठ अधिकारी अब मामले की समीक्षा कर रहे हैं।
