वाराणसी के पिशाचमोचन में अकाल मृत्यु के तर्पण के लिए अपनाई जाती है अनूठी परंपरा
वाराणसी के पिशाचमोचन तीर्थ पर अकाल मृत्यु को प्राप्त हुए पूर्वजों की शांति के लिए एक विशेष विधि अपनाई जाती है। यहाँ पितृपक्ष के दौरान घोड़े के कान, गाय की पूंछ और भैंस के सींग को स्पर्श कर तर्पण किया जाता है। इस कार्य के लिए संजाब नस्ल के विशेष घोड़ों को तैनात किया गया है, जो साल में केवल पंद्रह दिनों के लिए ही इस सेवा में संलग्न रहते हैं।
VIMARSHNAARAD TVवाराणसी स्थित पिशाचमोचन तीर्थ अपनी विशिष्ट धार्मिक मान्यताओं और तर्पण विधियों के लिए जाना जाता है। अमर उजाला की रिपोर्ट के अनुसार, यहाँ अकाल मृत्यु को प्राप्त हुए पितरों की आत्मा की शांति के लिए एक अनोखा विधान प्रचलित है। इस प्रक्रिया में श्रद्धालु विशेष रूप से पशुओं के अंगों का स्पर्श कर तर्पण संपन्न करते हैं।
इस धार्मिक अनुष्ठान में घोड़े के कान, गाय की पूंछ और भैंस के सींग को छूना अनिवार्य माना गया है। माना जाता है कि इस विधि से पितरों को मोक्ष की प्राप्ति होती है और वे तृप्त होते हैं। यह परंपरा सदियों से चली आ रही है और बड़ी संख्या में लोग अपनी श्रद्धा व्यक्त करने यहाँ आते हैं।
इस कार्य के लिए पिशाचमोचन पर संजाब नस्ल के दो घोड़ों को विशेष रूप से रखा गया है। इन घोड़ों की उपस्थिति पितृपक्ष शुरू होने से एक दिन पहले ही सुनिश्चित कर दी जाती है। ये पशु साल भर में केवल पंद्रह दिनों के लिए ही इस विशेष धार्मिक सेवा में अपना योगदान देते हैं।
स्थानीय मान्यताओं के अनुसार, पिशाचमोचन का यह स्थान पितृ दोष से मुक्ति दिलाने में अत्यंत प्रभावी माना जाता है। अकाल मृत्यु के कारण जो आत्माएं भटकती हैं, उन्हें शांति प्रदान करने के लिए श्रद्धालु यहाँ विशेष पूजा-अर्चना करते हैं।
पितृपक्ष के दौरान यहाँ आने वाले लोगों की भारी भीड़ देखी जाती है। लोग अपनी परंपराओं का पालन करते हुए पूरी निष्ठा के साथ इन अनुष्ठानों को पूरा करते हैं। यह स्थान न केवल धार्मिक आस्था का केंद्र है, बल्कि अपनी प्राचीन विधियों के कारण भी चर्चा में रहता है।
प्रशासन और स्थानीय तीर्थ पुरोहितों के अनुसार, इस दौरान सुरक्षा और व्यवस्था का भी ध्यान रखा जाता है। श्रद्धालु इन पशुओं के पास जाकर अपनी पूजा विधि संपन्न करते हैं। यह प्रक्रिया पूरी तरह से पारंपरिक मान्यताओं पर आधारित है।
इस प्रकार, वाराणसी का पिशाचमोचन तीर्थ अपनी अनूठी तर्पण परंपराओं के माध्यम से पितरों के प्रति सम्मान व्यक्त करने का एक महत्वपूर्ण माध्यम बना हुआ है। लोग दूर-दूर से यहाँ आकर अपने पूर्वजों की शांति के लिए प्रार्थना करते हैं।