सीओ जियाउल हक हत्याकांड: बेटे की शहादत के बाद बहू द्वारा ससुराल वालों को कोर्ट में घसीटने से माता-पिता आहत
वर्ष 2013 में प्रतापगढ़ में शहीद हुए सीओ जियाउल हक के माता-पिता ने अपनी बहू के व्यवहार पर गहरा दुख व्यक्त किया है। उनका कहना है कि बेटे की शहादत के बाद बहू ने उनसे संबंध तोड़ लिए थे और अब वह लगातार उन्हें अदालती मामलों में उलझा रही है। बुढ़ापे में मिल रहे इस मानसिक कष्ट से बुजुर्ग दंपत्ति बेहद परेशान और आहत हैं।
VIMARSHNAARAD TVउत्तर प्रदेश के प्रतापगढ़ में वर्ष 2013 में हुई सीओ जियाउल हक की हत्या का मामला एक बार फिर चर्चा में है। हालांकि, इस बार चर्चा का केंद्र कानून व्यवस्था नहीं, बल्कि शहीद अधिकारी के परिवार की निजी पीड़ा है। जियाउल हक के वृद्ध माता-पिता ने अपनी बहू पर गंभीर आरोप लगाए हैं। उनका कहना है कि बेटे की शहादत के बाद बहू ने उनसे दूरी बना ली थी और अब वह उन्हें बार-बार अदालती चक्कर लगाने पर मजबूर कर रही है।
शहीद के माता-पिता के अनुसार, बेटे की शहादत के बाद से ही बहू के साथ उनके रिश्ते खराब हो गए थे। उन्होंने बताया कि बहू ने ससुराल से अपना नाता पूरी तरह तोड़ लिया था। अब स्थिति यह है कि बहू उन्हें कानूनी विवादों में घसीट रही है, जिससे इस उम्र में उन्हें भारी मानसिक प्रताड़ना का सामना करना पड़ रहा है।
अमर उजाला नेटवर्क की रिपोर्ट के मुताबिक, बुजुर्ग दंपत्ति अपने जीवन के इस पड़ाव पर शांति की तलाश में थे, लेकिन बहू के इस रवैये ने उन्हें गहरे सदमे में डाल दिया है। उन्होंने अपनी व्यथा साझा करते हुए कहा कि एक तरफ बेटे को खोने का गम है और दूसरी तरफ परिवार के भीतर ही मिल रही यह कानूनी चुनौती उन्हें तोड़ रही है।
यह मामला तब से सुर्खियों में है जब 2013 में प्रतापगढ़ में सीओ जियाउल हक की ड्यूटी के दौरान हत्या कर दी गई थी। उस घटना ने पूरे प्रदेश को झकझोर कर रख दिया था। वर्षों बीत जाने के बाद भी परिवार के लिए न्याय और शांति का रास्ता आसान नहीं हो पाया है।
कानूनी जानकारों का मानना है कि पारिवारिक विवादों के चलते बुजुर्गों को कोर्ट में घसीटना एक संवेदनशील मुद्दा है। शहीद के माता-पिता का दर्द इस बात को रेखांकित करता है कि कैसे पारिवारिक कलह का असर किसी व्यक्ति के अंतिम वर्षों पर पड़ता है।
फिलहाल, शहीद के माता-पिता इस स्थिति से निपटने के लिए संघर्ष कर रहे हैं। उन्होंने अपनी बहू के व्यवहार को लेकर गहरी निराशा व्यक्त की है। उनके अनुसार, बेटे की शहादत के बाद उन्हें जिस सहारे की उम्मीद थी, उसके विपरीत उन्हें अदालती नोटिसों का सामना करना पड़ रहा है।
यह घटनाक्रम शहीद के परिवार के भीतर चल रहे गहरे विवाद को उजागर करता है। समाज के लिए यह एक दुखद उदाहरण है कि कैसे एक शहीद का परिवार अपनों के बीच ही कानूनी लड़ाई में उलझ गया है।