21 बार रिजेक्शन के बाद भी नहीं मानी हार, दीपक सिंह रावत ने लाखों की नौकरी छोड़ सेना में पाया मुकाम
दीपक सिंह रावत की कहानी दृढ़ संकल्प की एक मिसाल है। सर्विस सिलेक्शन बोर्ड (SSB) में लगातार 21 बार असफल होने के बावजूद उन्होंने हार नहीं मानी। अपनी 22वीं कोशिश में सफलता प्राप्त कर वे भारतीय सेना में लेफ्टिनेंट बने। उन्होंने एक प्रतिष्ठित कॉरपोरेट कंपनी में लाखों के पैकेज वाली नौकरी को ठुकराकर देश सेवा का रास्ता चुना और ओटीए गया से सिल्वर मेडल के साथ पास आउट हुए।
सफलता की राह हमेशा आसान नहीं होती, और दीपक सिंह रावत का सफर इसका जीता-जागता प्रमाण है। भारतीय सेना में लेफ्टिनेंट बनने का उनका सपना कई चुनौतियों से भरा था। उन्होंने सर्विस सिलेक्शन बोर्ड (SSB) के इंटरव्यू में लगातार 21 बार असफलता का सामना किया। हालांकि, इन असफलताओं ने उनके हौसले को तोड़ने के बजाय और अधिक मजबूत बना दिया।
दीपक की कहानी तब और प्रेरणादायक हो जाती है जब पता चलता है कि उन्होंने सेना में शामिल होने के लिए एक बड़ी कॉरपोरेट नौकरी को छोड़ दिया था। लाखों रुपये के पैकेज वाली उस नौकरी को ठुकराना उनके लिए एक कठिन फैसला था, लेकिन देश सेवा का जज्बा उनके लिए सर्वोपरि था। उन्होंने अपने लक्ष्य पर ध्यान केंद्रित रखा और अपनी कमियों पर काम करना जारी रखा।
उनकी मेहनत आखिरकार 22वीं कोशिश में रंग लाई। SSB में सफलता मिलने के बाद, उन्होंने ऑफिसर्स ट्रेनिंग एकेडमी (OTA) गया में प्रशिक्षण प्राप्त किया। वहां उन्होंने न केवल कठिन सैन्य प्रशिक्षण पूरा किया, बल्कि अपनी उत्कृष्ट प्रदर्शन के दम पर सिल्वर मेडल भी हासिल किया। यह उपलब्धि उनकी निरंतरता और कड़ी मेहनत का परिणाम थी।
दीपक सिंह रावत का यह सफर उन युवाओं के लिए एक बड़ा सबक है जो अपनी पहली या दूसरी असफलता से निराश हो जाते हैं। उनका मानना है कि असफलता केवल एक पड़ाव है, अंत नहीं। यदि व्यक्ति अपने लक्ष्य के प्रति ईमानदार रहे और लगातार प्रयास करता रहे, तो सफलता निश्चित रूप से मिलती है।
आज दीपक भारतीय सेना में लेफ्टिनेंट के रूप में देश की सेवा कर रहे हैं। उनकी यह कहानी न केवल सेना में जाने के इच्छुक युवाओं के लिए प्रेरणा है, बल्कि यह सिखाती है कि कैसे विपरीत परिस्थितियों में भी अपने सपनों को पूरा किया जा सकता है। लाखों की सुख-सुविधाओं को छोड़कर वर्दी पहनने का उनका निर्णय आज कई लोगों के लिए मिसाल बन गया है।
