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भारत और सेशेल्स ने नीली अर्थव्यवस्था और मत्स्य पालन में रणनीतिक सहयोग बढ़ाने पर चर्चा की

भारत और सेशेल्स ने मत्स्य पालन, जलीय कृषि और नीली अर्थव्यवस्था में द्विपक्षीय सहयोग को मजबूत करने के लिए एक उच्च-स्तरीय बैठक की। दोनों देशों ने समुद्री संसाधनों के सतत उपयोग के लिए एक रोडमैप तैयार करने और तकनीकी आदान-प्रदान बढ़ाने पर सहमति जताई। इस चर्चा में डिजिटल नवाचार, कृत्रिम बुद्धिमत्ता के उपयोग और टूना मछली प्रसंस्करण जैसे क्षेत्रों में संयुक्त विकास की संभावनाओं पर जोर दिया गया।

भारत और सेशेल्स ने नीली अर्थव्यवस्था और मत्स्य पालन में रणनीतिक सहयोग बढ़ाने पर चर्चा की
आधिकारिक स्रोत का चित्र: Press Information Bureau, Government of India · PIB reusable material · Press Information Bureau

भारत सरकार के मत्स्य पालन विभाग और सेशेल्स के एक प्रतिनिधिमंडल ने हाल ही में एक उच्च-स्तरीय द्विपक्षीय बैठक आयोजित की। भारतीय पक्ष का नेतृत्व सचिव डॉ. अभिलक्ष लिखी ने किया, जबकि सेशेल्स के प्रतिनिधिमंडल की अगुवाई मंत्री वालेस कॉसग्रो ने की। इस बैठक का मुख्य उद्देश्य दोनों देशों के बीच मौजूदा समुद्री सहयोग की समीक्षा करना और भविष्य के लिए एक ठोस कार्य योजना तैयार करना था।

दोनों देशों ने हिंद महासागर क्षेत्र में खाद्य सुरक्षा और आर्थिक स्थिरता के लिए आपसी तालमेल को अनिवार्य बताया। भारत ने अपने मत्स्य पालन क्षेत्र की उपलब्धियों को साझा करते हुए बताया कि देश का मछली उत्पादन 19.7 मिलियन टन के रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच गया है। साथ ही, समुद्री खाद्य निर्यात का मूल्य 8.46 बिलियन डॉलर दर्ज किया गया है।

चर्चा के दौरान समुद्री जलीय कृषि, आधुनिक हैचरी की स्थापना और टूना मछली पकड़ने की तकनीकों को बेहतर बनाने जैसे तकनीकी क्षेत्रों पर विशेष ध्यान दिया गया। दोनों पक्षों ने ज्ञान हस्तांतरण के लिए संस्थागत प्रशिक्षण कार्यक्रमों और संयुक्त वैज्ञानिक अध्ययनों की आवश्यकता पर बल दिया।

नवाचार को बढ़ावा देने के लिए कृत्रिम बुद्धिमत्ता और डेटा प्रणालियों के उपयोग पर भी विचार-विमर्श हुआ। प्रतिनिधिमंडलों ने मछली पकड़ने के बाद के प्रबंधन और मूल्य श्रृंखला के विकास के लिए नई तकनीकों को अपनाने पर सहमति व्यक्त की।

सेशेल्स के प्रतिनिधिमंडल ने मत्स्य पालन और जलीय कृषि के क्षेत्र में एक द्विपक्षीय समझौता ज्ञापन के माध्यम से सहयोग को गति देने में गहरी रुचि दिखाई। उन्होंने प्रशासनिक निकायों और शोधकर्ताओं के बीच निरंतर संवाद के लिए एक संस्थागत ढांचा बनाने का सुझाव दिया।

बैठक का समापन इस साझा संकल्प के साथ हुआ कि दोनों देश अपनी कूटनीतिक प्रतिबद्धताओं को परिणाम-केंद्रित योजनाओं में बदलेंगे। भविष्य में नियमित दौरों और तकनीकी आदान-प्रदान के माध्यम से समुद्री समृद्धि को सुरक्षित करने का लक्ष्य रखा गया है।

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