भारत में एंटीबायोटिक दवाओं का बेअसर होना बना गंभीर खतरा, आईसीएमआर की रिपोर्ट ने बढ़ाई चिंता
इंडियन काउंसिल ऑफ मेडिकल रिसर्च की एक हालिया रिपोर्ट ने देश में बढ़ते ड्रग रेजिस्टेंट संक्रमणों को लेकर चेतावनी जारी की है। आंकड़ों के मुताबिक, 2022 से 2025 के बीच 61.1 प्रतिशत मरीज कार्बेपनेम-रेजिस्टेंट पाए गए हैं, जिन पर सामान्य एंटीबायोटिक दवाएं काम नहीं कर रही हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि बिना डॉक्टरी सलाह के दवाओं का सेवन इस समस्या को और अधिक जानलेवा बना रहा है, जिससे मरीजों की जान पर बन आई है।
VIMARSHNAARAD TVइंडियन काउंसिल ऑफ मेडिकल रिसर्च (ICMR) द्वारा जारी किए गए नए आंकड़े स्वास्थ्य क्षेत्र के लिए एक बड़ी चुनौती की ओर इशारा कर रहे हैं। रिपोर्ट के अनुसार, भारत में ड्रग रेजिस्टेंट बैक्टीरियल संक्रमण तेजी से फैल रहा है, जो अब मरीजों की मौत का एक प्रमुख कारण बनता जा रहा है। यह स्थिति तब और गंभीर हो जाती है जब शरीर पर एंटीबायोटिक दवाओं का असर होना बंद हो जाता है।
अध्ययन में 2022 से 2025 के बीच के आंकड़ों का विश्लेषण किया गया है। इन आंकड़ों से पता चलता है कि लगभग 61.1 प्रतिशत मरीज कार्बेपनेम-रेजिस्टेंट श्रेणी में आते हैं। कार्बेपनेम एक शक्तिशाली एंटीबायोटिक दवा मानी जाती है, लेकिन जब बैक्टीरिया इसके प्रति प्रतिरोधी हो जाते हैं, तो इलाज के विकल्प बेहद सीमित हो जाते हैं।
विशेषज्ञों का कहना है कि एंटीबायोटिक दवाओं का अंधाधुंध और बिना डॉक्टरी सलाह के उपयोग इस संकट की जड़ है। कई लोग मामूली बीमारियों में भी खुद से दवाएं लेना शुरू कर देते हैं, जिससे बैक्टीरिया इन दवाओं के खिलाफ अपनी प्रतिरोधक क्षमता विकसित कर लेते हैं। इसे चिकित्सा जगत में एंटीमाइक्रोबियल रेजिस्टेंस कहा जाता है।
जब बैक्टीरिया दवाओं के प्रति प्रतिरोधी हो जाते हैं, तो सामान्य संक्रमण भी जानलेवा साबित होने लगते हैं। अस्पताल में भर्ती मरीजों के लिए यह स्थिति विशेष रूप से खतरनाक है, क्योंकि वहां पहले से ही कमजोर प्रतिरक्षा प्रणाली वाले लोग मौजूद होते हैं। यदि समय रहते इस पर नियंत्रण नहीं पाया गया, तो भविष्य में सामान्य सर्जरी या छोटी चोटों का इलाज करना भी मुश्किल हो सकता है।
आईसीएमआर की यह रिपोर्ट सार्वजनिक स्वास्थ्य के प्रति एक गंभीर चेतावनी है। स्वास्थ्य विशेषज्ञों ने लोगों से अपील की है कि वे किसी भी प्रकार की एंटीबायोटिक दवा का सेवन केवल योग्य चिकित्सक की सलाह पर ही करें। दवाओं का कोर्स अधूरा छोड़ना भी बैक्टीरिया को और अधिक शक्तिशाली बनाने में मदद करता है।
सरकार और स्वास्थ्य संस्थानों को अब इस दिशा में जागरूकता अभियान चलाने की आवश्यकता है। एंटीबायोटिक दवाओं की बिक्री पर सख्त निगरानी और मरीजों को सही जानकारी देना ही इस समस्या से निपटने का एकमात्र रास्ता है। यह न केवल व्यक्तिगत स्वास्थ्य का मामला है, बल्कि देश की स्वास्थ्य प्रणाली की मजबूती से भी जुड़ा है।
निष्कर्ष के तौर पर, ड्रग रेजिस्टेंस की समस्या अब एक वैश्विक स्वास्थ्य संकट का रूप ले रही है। भारत में बढ़ते इन मामलों को देखते हुए यह स्पष्ट है कि एंटीबायोटिक दवाओं के उपयोग को लेकर अब अधिक जिम्मेदारी बरतने का समय आ गया है।